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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

◆ शब्द– अल्ला और अल्लाह।
★ अल्ला– यह ‘संस्कृत-भाषा’ का शब्द है, जो लिंग-निर्धारण के अन्तर्गत स्त्रीलिंग का शब्द है। अधिकतर कोशकार ‘अल्ला’ शब्द को ‘अरबी-भाषा’ बताते हैं, जो कि ‘भयंकर’ दोष है। शब्दभेद की दृष्टि से यह संज्ञा-शब्द है। अल्ला शब्द ‘अल्’ धातु का है, जिसका अर्थ ‘आभूषण’ होता है। इस धातु के अन्त में ‘क्विप्’ प्रत्यय जुड़ा हुआ है। इस प्रत्यय के लगते ही ‘अल्ला’ शब्द बनता है। इसका अर्थ ‘पराशक्ति’ है। इसका एक अन्य अर्थ ‘माता’ भी है। ‘अल्’ में जब ‘ला’ धातु जुड़ता है और ‘क’ का योग होता है तब ‘टाप्’ प्रत्यय का अस्तित्व उभरता है। इस ‘ला’ धातु का अर्थ है, ‘लेना’।

★ अल्लाह– यह अरबी-भाषा का शब्द है; किन्तु यहाँ यह पुंल्लिंग-शब्द है। इसका अर्थ ईश्वर और ख़ुदा है। ‘ख़ुदा’ फ़ारसी-भाषा का पुंंल्लिंग-शब्द है, जिसका अर्थ ‘ईश्वर’ होता है। ‘अल्लाह’ शब्द ‘विस्मय’, ‘प्रतिष्ठा’ तथा ‘श्लाघासूचक’ उद्गार है। इसी अल्लाह शब्द से ‘अल्लाह तआला’ (ईश्वर, जो सबसे बढ़कर है।); ‘अल्लाहबेली’ (ईश्वर तुम्हारा मित्र और रक्षक है।), ‘अल्लाहो अकबर’ (ईश्वर महान् है।) आदिक पदों का सर्जन होता है। एक बहुश्रुत कहावत भी है, “अल्लाह मियाँ की गाय”, जिसका अर्थ है, अत्यन्त सीधा व्यक्ति।

—————————————————————— (सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ अक्तूबर, २०२१ ईसवी।)