कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

निम्नांकित शब्दों को सविस्तार समझने के लिए अपने स्वस्थ तर्क-चिन्तन को बोध का आधार बनायें।

शुद्ध और उपयुक्त शब्द :– समाधि, उठावनी, पंचतत्त्व में विलीन, पार्थिव शरीर तथा पन्ना-पृष्ठ/पेज।

★ समाधि– इस शब्द को लेकर समाज में बहुत ही भ्रम है और संशय भी। यहाँ पर दो बातें उभर कर आती हैं :– पहली बात, शरीरान्त के बाद ‘समाधि’ संस्कार नहीं होता; दूसरी बात, किसी भी व्यक्ति की समाधि दी नहीं जाती। ये अशुद्धियाँ और शब्द-प्रयोग में विकृति इसलिए दिखायी देती हैं कि प्रयोगकर्त्ता और प्रयोगकर्त्री को ‘समाधि’ का अर्थ और उसकी क्रिया-प्रक्रिया का ज्ञान नहीं होता।

समाधि ‘श्वसनतन्त्र’ का विषय है, जिसमें ‘योगक्रिया’ की विशेष महत्ता रहती है। ‘समाधि’ योगसाधना का चरम फल है। इसके अन्तर्गत मनुष्य आधि-व्याधि से मुक्त होकर नाना प्रकार की शक्ति अर्जित करता है। ‘समाधि’ दो प्रकार की होती है :– पहला, मनुष्य जीवितावस्था में समाधि लेता है और मृत्यु को प्राप्त कर जाता है; दूसरा, मनुष्य जीवितावस्था में समाधि लेता है और तदनन्तर जब तक चाहता है, जीवित रहता है। यह एक प्रकार की ‘जिजीविषा’ (जीने की इच्छा) है। एक बात और, समाधि लेने के लिए किसी कन्दरा अथवा भूभाग के भीतर प्रवेश करना आवश्यक नहीं है। सिद्ध मनुष्य कहीं भी समाधि ग्रहण कर सकता है। ‘समाधि-प्रक्रिया’ से सम्बद्ध होते समय मनुष्य को चार स्थितियों का बोध होता है :– (१) संप्रज्ञात (२) सवितर्क (३) सविचार (४) सानन्द। ये चारों स्थितियाँ ‘चेतना’ के धरातल पर प्रकट होती हैं। आप यदि किसी विशिष्ट मनुष्य के शरीरान्त होने के बाद उसके समाधि लेने अथवा उसे समाधि देने की बात कहेंगे तो आपका प्रयोग ‘हास्यास्पद’ कहलायेगा। ‘जीव’ और ‘ब्रह्म’ का सम्मिलन ‘समाधि’ है। ऐसे में, समाधि ली जाती है, दी नहीं जाती। ‘समाधि’ लेने की क्षमता और सामर्थ्य सामान्य मनुष्य में नहीं रहती; इसके लिए ‘सात्त्विक’ वृत्ति से युक्त साधक के पास ही ‘समाधि’ ग्रहण करने की पात्रता रहती है, जिसके लिए साधु-साध्वी, सन्त-महात्मा का होना आवश्यक नहीं है। एक गृहस्थ भी अपने योगबल से समाधि ग्रहण कर सकता है। इसे ही ‘ब्रह्म में लीन’ कहा गया है। निश्चेष्ट शरीर कभी ‘समाधि’ से जुड़ नहीं सकता। शरीरान्त के बाद केवल ‘अन्त्येष्टि क्रिया’ का प्रयोग करना चाहिए, जो किसी भी सम्प्रदाय के लिए पूर्णत: उपयुक्त शब्द है।

★ उठावनी– यात्रा सदैव जीवित व्यक्ति करता है और जीवित व्यक्ति को ही करायी जाती है। मनुष्य अपने शैशव काल से बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था तक जीवनयात्रा करता है; अन्तत:, उसका शरीरान्त हो जाता है। वास्तव में, जीवन की अन्तिम यात्रा ‘वृद्धावस्था’ की गतिविधियाँ ही हैं। मृत्यु प्राप्त करने के बाद किसी भी प्रकार की यात्रा करने का कोई विषय ही नहीं है। यह भी आवश्यक नहीं कि हर कोई जीवन की अन्तिम यात्रा कर ही लेता हो; अल्पायु में भी मृत्यु हो जाती है। शवदहन अथवा भूमिगत करने के लिए ‘अन्तिम यात्रा’ और ‘शवयात्रा’ के स्थान पर ‘उठावनी’-जैसे शब्दप्रयोग ही उपयुक्त कहलायेंगे। शव को काँधे पर अथवा वाहन में रखने से पहले उठाकर रखा जाता है, फिर उसे निर्धारित स्थान के लिए ले जाया जाता है।

★ पंचतत्त्व में विलीन– प्राय: हमारा समाज शवदहन और शवभूमिगत होते ही मान लेता है कि शरीर ‘पंचतत्त्व’ (‘पंचतत्व’, ‘पंचतत्त्वों’, ‘पंचतत्वों’ अशुद्ध हैं।) में ‘अब’ विलीन हो गया है, जबकि सत्य यह है कि किसी भी मनुष्य/जीवधारी के शरीर से जैसे ही पंचतत्त्व– ‘क्षिति, जल, अग्नि, गगन तथा वायु’ अपने गुणधर्म लिये एक साथ निकलते हैं वैसे ही उसकी मृत्यु हो जाती है। शवदहन और शवभूमिगत तो मानव-शव को विधिवत् नष्ट करने के लिए किये जाते हैं, ताकि शव के विकृत रूप और प्रभाव से समाज को कष्ट न हो।

★ पार्थिव शरीर– जीवधारी का शरीर जन्म से मृत्यु तक ‘पार्थिव’ कहलाता है; किन्तु हमारा समाज किसी के शरीरान्त होने के बाद ही ‘पार्थिव शरीर’ कहता आ रहा है। इसको समझने के लिए आपको ‘पार्थिव’ शब्द के साथ (यहाँ ‘से’ अशुद्ध है।) जुड़ना होगा। आपको सर्वप्रथम ‘पृथ्वी’ शब्द की रचना को समझना होगा। इस शब्द की निष्पत्ति संस्कृत-भाषा के ‘पृथु’ शब्द से हुई है, जो ‘प्रथ्’ धातु का शब्द है। ‘प्रथ्’ का अर्थ ‘फेंकना’ है। इसी ‘प्रथ्’ में ‘कु’ के जुड़ते ही ‘पृथु’ की रचना होती है। इसी ‘पृथु’ में जब ‘ङीष्’ प्रत्यय का योग होता है तब ‘पृथ्वी’ की उत्पत्ति होती है। जब ‘पृथ्वी’ में ‘अञ्’ प्रत्यय जुड़ता है तब ‘पार्थिव’ शब्द का सर्जन होता है। ‘पार्थिव’ के अर्थ हैं :– पृथ्वी-सम्बन्धी; पृथ्वी से उत्पन्न, इसीलिए पंचतत्त्व में से एक ‘क्षिति’ (पृथ्वी) है। यह कहावत समाज में चर्चित है, “मिट्टी का चोला ‘मिट्टी’ में मिल जायेगा। उसके बाद भी वह व्यवहार-स्तर पर उस कहावत को स्वीकार नहीं कर पाता।

★ पन्ना-पृष्ठ/पेज– इन दिनों ‘पन्ना-पृष्ठ/पेज’ शब्द चर्चा में हैं। इसका मुख्य कारण है, हाल ही में एक धर्माचार्य नरेन्द्र गिरि (यहाँ ‘गिरी’ अशुद्ध है।) के शरीरान्त होने के बाद जो ‘आत्महत्या-विवरण’ प्रकाश में आया है, उसे कोई ‘आठ पन्ने’ का बता रहा है तो कोई ‘आठ पेज’ का। ऐसा लगता है, मानो इन शब्दों को व्यवहार में लानेवाले लोग और तन्त्र ‘पन्ना’ और ‘पेज’ को एक ही समझ रहे हों, जबकि सत्य इससे परे है। हमारे हाथ में जब कोई एक सादा काग़ज़ होता है तब वह ‘एक पन्ना’ कहलाता है। ‘पन्ना’ का शुद्ध शब्द ‘पर्ण’ है। एक ‘पर्ण’/’पन्ना’ में दो पृष्ठ/पेज होते हैं। इस प्रकार कथित ‘आत्महत्या-विवरण’ आठ पन्ने (सोलह पृष्ठ) के हैं अथवा आठ पृष्ठ के हैं, यह अज्ञात है। यदि किसी काग़ज़ के एक ओर ही कुछ लिखा रहता है तो वह ‘एकपृष्ठीय लेखन’ कहलाता है। इस प्रकार शुद्ध और उपयुक्त शब्दों को लेकर समाज को भ्रमित किया जा रहा है, जिसमें सुशिक्षित जन की सर्वाधिक भूमिका है, जो ”गान्धी के तीन बन्दर”-जैसे दिखते आ रहे हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)