आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश (‘सन्देश’ अशुद्ध है।)

सामर्थ्य के अवयव (तर्क अथवा वाक्य के पञ्च-अंग :– उदाहरण, उपनयन, निगमन, प्रतिज्ञा तथा हेतु) सभी के भीतर हैं; आवश्यकता है, टटोलने की। सामर्थ्य पहले भ्रूणावस्था मे रहती है, फिर भीतर-ही-भीतर उसका विकास होता रहता है और क्षरण भी। यदि मनुष्य ‘कूपमण्डूक’ (कुआँ का मेढक/,दादुर; षष्ठी तत्पुरुष समास; सम्बन्ध कारक) बना रहेगा तो उसका व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व (‘कृतित्व’ अशुद्ध है।) भी संकुचित लक्षित होगा। इस कारण उसकी विचारप्रक्रिया कुन्द दिखेगी और वह ‘आत्ममुग्ध’ बना रहेगा। वह स्थिति भयावह होती है, जिससे बुद्धि की तीव्रता जाती रहती है।

मनुष्य जीवन का केवल ‘उपजीवी’ (दूसरे के सहारे निर्वाह करनेवाला) के रूप मे यापन (व्यतीत करना) करता है, तो उसका जीवन निष्फल (जिसमें फल न लगे।) है और भविष्य विफल (‘असफल’ अशुद्ध है)। यही कारण है कि जो भी मनुष्य अपने ध्येय, उद्देश्य तथा लक्ष्य का संधान करने का कौशल अर्जित कर लेता है, वह अपनी साधना मे सफल हो जाता है। अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए उसे नाना दुर्गम स्थितियों-परिस्थितियों से ”दो-चार होना” (सामना होना) पड़ता है। वैसी विषम परिस्थितियों मे जो भी मनुष्य कठिनाइयों और ललकार (चुनौती) की ”आँखों-मे-आँखें-डाल” (आत्मविश्वास का परिचय देना) कर्मपथ पर अग्रसर रहता है, विजयश्री उसका ‘कण्ठहार’ बन जाती है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ सितम्बर, २०२३ ईसवी।)