सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

‘आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ ‘गर्रा नदी’-तटप्रान्त की ओर

हमारी पाठशाला निकट भविष्य मे उत्तरप्रदेश मे रोहिलखण्ड-मण्डल के दक्षिण-पूर्व मे स्थित एक ‘जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण-संस्थान’ (‘डाइट) मे आयोजित की जानेवाली त्रिदिवसीय कर्मशाला मे अपनी भाषाशुचिता के साथ संलक्षित होगी। वह मण्डल ‘रुहेलखण्ड’ के नाम से चर्चित है। जिस जनपद मे शैक्षिक एवं भाषिक कर्मशाला का आयोजन किया जायेगा, वह भौगोलिक दृष्टि से २७.३५ उत्तरी अक्षांश और ७९.३७ पूर्वी देशान्तर पर स्थित है।

हम यदि उसकी ऐतिहासिक महत्ता पर दृष्टिनिक्षेपण करते हैं तो विदित होता है कि भारतीय स्वाधीनता-संग्राम मे १८५७ ईसवी के प्रथम स्वातन्त्र्य-समर से लेकर १९४२ ईसवी के ‘भारत छोड़़ो’ आन्दोलन तक उक्त जनपद की प्रमुख भूमिका रही है। आपको अपने परिणाम तक पहुँचने मे सहजता हो, इसके लिए इतना और जान लें कि वह ‘शहीदगढ़’ वा ‘शहीदों की नगरी’ के नाम से विश्रुत है।

वहाँ बहुत बड़ी संख्या मे विद्यार्थी और अध्यापकवृन्द तीन दिनो तक एक ‘जागरूक विद्यार्थी’ के रूप मे एक-दूसरे से सीखेंगे और एक-दूसरे को सिखायेंगे। निस्सन्देह, वह कर्मशाला ‘ऐतिहासिक’ सिद्ध होगी।

अनुष्ठान की औपचारिकताएँ पूर्ण होते ही हमारी कर्मशाला आरम्भ हो जायेगी, जो प्रतिदिन पाँच से सात घण्टे तक संचालित होती रहेगी; मध्य मे स्वल्पाहार आदिक के लिए एक लघु अन्तराल रहेगा, फिर हम स्वत: स्फूर्त आन्तरिक अभिप्रेरणा के साथ ऊर्जस्वित-ओजस्वित रूप मे पूर्ववत् स्थिति को प्राप्त करते अनुभव करायेंगे।

हमारी कर्मशाला मे समस्त विद्यार्थी-अध्यापक एक ‘सजग प्रशिक्षणार्थी’ के रूप मे ही संलक्षित होंगे; क्योंकि हमारा उद्देश्य प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी की सारस्वत जिज्ञासा का प्रशमन करना होगा। उसमे कहीं कोई न वक्ता होगा और न ही सम्भाषणकर्त्ता। हम बतायेंगे, सिखायेंगे तथा लिखायेंगे भी; किस-किसने क्या और कितना समझा है तथा लिखा है, उसका परीक्षण भी करेंगे। जैसा कि आप सबको ज्ञात होगा, हम अपनी पाठशाला मे इस छोर से उस छोर पर बैठे समस्त प्रशिक्षणार्थियों तक पहुँचते हैं; उनसे प्रश्न-प्रतिप्रश्न करते हैं तथा उत्तर-प्रत्युत्तर भी प्राप्त करते हैं, ‘अन्यथा’ की स्थिति मे उन्हें सकारण और सोदाहरण समझाते हैं। वास्तव मे, यही पाठशाला है और कर्मशाला का ‘हेतु’ (प्रयोजन) भी।

भाषा, भाषाविज्ञान, व्याकरण, संरचना, साहित्यादिक की नयी शिक्षानीति के परिप्रेक्ष्य मे किस प्रकार की उपयोगिता-महत्ता सिद्ध हो सकती है, हमारी कर्मशाला इसी विषयाशय पर केन्द्रित रहेगी। हम इसी क्रम मे ‘शब्द-शब्द विज्ञान’ का विस्तार और गवेषणामूलक प्रवृत्ति का विकास करते हुए, ‘शब्दसंधान’ करेंगे।

तो आइए! उस विलक्षण क्षण की प्रतीक्षा करते हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ अक्तूबर, २०२३ ईसवी।)