शब्द– परिवेश और परिवेष।
★ परिवेश– यह ‘संस्कृत-भाषा’ का शब्द है। शब्दभेद की दृष्टि से यह विकारी ‘संज्ञा-शब्द’ है। लिंगानुशासन इसे ‘पुंल्लिंग’ (‘पुंलिंग’, ‘पुल्लिंग’ अशुद्ध हैं।) के रूप मे स्वीकार (‘स्वीकारता’ अशुद्ध है।) करता है। परिवेश का मूल शब्द ‘वेश’ है, जो कि ‘संज्ञा का पुंल्लिंग-शब्द’ है। इसके अर्थ हैं :– प्रवेश; प्रवेश-द्वार/मार्ग; रहने का स्थान; वेश्या का घर; शिविर आदिक। ‘वेश’ शब्द से पूर्व ‘परि’ उपसर्ग का प्रयोग है, जिसका यहाँ अर्थ ‘चारों ओर’ अथवा ‘आस-पास’ है। परिवेश ‘विश्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘प्रवेश करना’ है। इस धातु के अन्त मे ‘घञ्’ प्रत्यय जुड़ता है, जिसके फलस्वरूप ‘परिवेश’ का सर्जन होता है। परिवेश के समानार्थी शब्द हैं :– परिधि, घेरा, वेष्टन इत्यादिक। सुमित्रानन्दन पन्त ने कहा है, ” पुण्य का रच तुमने परिवेश।” हलके (‘हल्का-हल्की-हल्के’ अशुद्ध हैं।) बादलों की विशेष स्थिति के कारण सूर्य अथवा चन्द्रमा की ओर बन जानेवाला एक प्रकार का मण्डल भी ‘परिवेश’ कहलाता है। किरणों का वह मण्डल, जो कभी-कभी सूर्य अथवा चन्द्रमा की ओर बन जाता है, ‘परिवेश’ कहलाता है।
अब इसमे सम्मिलित ‘विश्’ शब्द को समझें। यह संस्कृत-भाषा का संज्ञा, स्त्रीलिंग-शब्द है, जो ‘विश्’ धातु मे ‘क्विप्’ प्रत्यय के जुड़ने से अस्तित्व में आता है। इसके समानार्थी शब्द हैं :– प्रजा, रिआया और भिन्नार्थक कन्या हैं। इसका विशेषण-शब्द ‘जिसने जन्म लिया हो’ है, जो अनेक शब्दों/वाक्यांश के लिए प्रयुक्त होता है। एक अन्य शब्द ‘विश’ भी है। यह भी ‘विश्’ धातु का शब्द है, जिसके साथ ‘क’ के योग से ‘विश’ की रचना होती है। यह पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग में व्यवहृत होता है। पुंल्लिंग मे इसके समानार्थी शब्द मृणाल, कमल की डण्डी इत्यादिक हैं, जबकि भिन्नार्थक शब्द मनुष्य; चाँदी आदिक हैं। स्त्रीलिंग मे इसके अर्थ कन्या; लड़की हैं।
★ परिवेष– यह ‘संस्कृत-भाषा’ का शब्द है। शब्दभेद के विचार से यह विकारी ‘संज्ञा-शब्द’ है। लिंग-प्रकरण के अनुसार, इसका व्यवहार ‘पुंल्लिंग’ मे होता है। परिवेष ‘विष्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘व्याप्त होना’ है। इस धातु के अन्त मे ‘घञ्’ प्रत्यय के जुड़ते ही ‘परिवेष’ की निष्पत्ति होती है। इसके अर्थ हैं :– आवेष्टित करनेवाली वस्तु; प्रभामण्डल। इस तरह से इसका भी वही अर्थ है, जो ‘परिवेश’ का है। इसके भिन्नार्थक शब्द हैं :– परकोटा; भोजन परोसना। इसी परिवेष से ‘परिवेषक’ शब्द की रचना हुई है। यह भी ‘संस्कृत-भाषा’ का शब्द है, जिसका ‘संज्ञा’ के ‘पुंल्लिंग-शब्द’ के रूप मे सेवन होता है। यहाँ प्रत्यय का अन्तर है; उपसर्ग वही ‘परि’ और धातु भी ‘विष्’ है। इस प्रकार इस धातु मे ‘ण्वुल्’ प्रत्यय के जुड़ते ही ‘अक’ (परिवे’षक’) की ध्वनि निर्गत होती है। परिवेषक का अर्थ है, भोजन परोसने/परसनेवाला। इसी शब्द से जुड़ा है, ‘परिवेषण’, जिसका अर्थ है, भोजनादिक परोसने/परसने का काम। यहाँ भी पूर्व में ‘परि’ उपसर्ग है और ‘विष’ धातु है, जिसमें ‘ल्युट्’ प्रत्यय का योग है, जिस कारण ‘अण-अन’ की ध्वनि प्राप्त होती है। ‘पंचवटी’ के कृती कृतिकार मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं, “परिवेषणतक मृदुल करों से तुम्हें न करने दूँगी मैं।”
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ जून, २०२२ ईसवी।)