‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की प्रायोगिक पाठशाला’

चित्र में प्रतीक्षालय और Development की वर्तनी देखें ।

◆ नीचे दिये गये ‘चित्र’ को गम्भीरतापूर्वक देखें।
■ न हिन्दी और न ही अँगरेजी का बोध!
‘बस-विभाग’ की मूढ़ता अथवा ‘वाराणसी विकास प्राधिकरण’ का प्रमाद कहा जाये– न हिन्दी का संज्ञान और न ही अँगरेजी का बोध!

★ पहले हिन्दी-ज्ञान की परख :—
यात्री प्रतिक्षालय के स्थान पर ‘यात्री-प्रतीक्षालय’ होता है।

हमारे कुछ अध्यापक, विद्यार्थी, साहित्यकार, कवि-कवयित्री तथा शेष बुद्धिजीवीगण ‘प्रतीक्षा’ को ‘प्रतिक्षा’ लिखते और उच्चारण करते हैं।

अब ‘प्रतीक्षा’ को समझें :—
यह संस्कृत का शब्द है, जो ‘ईक्ष्’ धातु का स्त्रीलिंग शब्द है। ‘ईक्ष’ धातु में ‘आ’ (‘च्छा’) ध्वनि का संयोग है। इसमें ‘टाप्’ प्रत्यय लगा है। इस प्रकार हमें ज्ञात होता है कि ‘ईक्षा’ से पहले ‘प्रति’ उपसर्ग जुड़ा हुआ है।

वह स्थिति/अवस्था/दशा, जिसमें कोई उत्सुकतापूर्वक किसी आनेवाले व्यक्ति/वस्तु की बाट जोहता रहता है, ‘प्रतीक्षा’ कहलाती है; जैसे– मैं पिता जी-द्वारा प्रेषित किये गये ‘धनादेश’ (मनी ऑर्डर) की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

★ अब अँगरेजी-बोध का उद्घाटन :–
PASSENGER के स्थान पर PASSENGERS’ होगा; क्योंकि इसका अर्थ ‘यात्रियों का’ होता है। यदि ‘यात्रियों के लिए’ का अर्थ हो तब भी अँगरेजी अशुद्ध है। अँगरेजी में शुद्ध प्रयोग है— Waiting Place for Passengers।

DEVOLPMENT के स्थान पर ‘DEVELOPMENT’ होता है। यहाँ पर वर्तनी को लिखते समय दो अक्षरों का उपयुक्त प्रयोग नहीं हो पाया है। V के आगे ‘E’ और L के आगे ‘O’ का प्रयोग होता है। प्रयोग करते समय उक्त अशुद्धियाँ हुई हैं; कारण कुछ भी रहा हो, दोष अन्तत:; ‘दोष’ होता है।

Development का मूल शब्द ‘Develop’ है। यह दो प्रकार का होता है। पहला, जो स्वाभाविक/नैसर्गिक होता है, उसे Growth (वर्द्धन/विकास) कहते हैं; जैसे– सन्तान का अवस्था-वर्द्धन, पौधे का विकास; दूसरा, जो कृत्रिम/अस्वाभाविक होता है, उसे ‘Develop’ कहते हैं; जैसे— भवन-निर्माण।

अब प्रश्न है, ‘केन्द्र-अधीक्षक’ इतना अज्ञानी है; काग़ज़ पर दिखनेवाले वहाँ के सुशिक्षित अधिकारी भाषा-स्तर पर इतने दुर्बल हो चुके हैं कि प्रतिदिन दृष्टिपथ पर आतीं उक्त अशुद्धियों को वे शुद्ध समझते आ रहे हैं। वहीं यह नहीं भूलना चाहिए कि वह उस देश के प्रधानमन्त्री का संसदीय क्षेत्र है, जो कभी ‘जगद्गुरु’ की संज्ञा से समलंकृत था।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ दिसम्बर, २०१९ ईसवी)

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