वापस होने की आस

जिन दिनों मैं हमेशा की तरह एक यात्रा करती हुई अपने गंतव्य पर पहुंचने की आशा में प्रयागराज से ट्रेन पकड़ रही थी । सारनाथ ट्रेन आने वाली थी सभी यात्री अपने सामान के साथ डिब्बे व सीट की प्रतीक्षा में उत्सुक प्लेटफार्म पर खड़े होकर देख रहे थे । मेरे पास ज्यादा समान नही था एक बैग जिसे आसानी से लेकर यात्रा किया जा सकता है । ट्रेन आ गई थी मैं अपनी सीट पर बैठ गई , मन बोझिल था घर से दूर जा रही थी। रह रहकर कुछ यादें व पापा की नसीहतें मुझे चौकन्ना करती रहती थी।

ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी थी , मैं भी निश्चित होकर अपनी बर्थ में आरामदायक स्थिति में बैठ गई । बिलासपुर मुझे उतरना रहता इसलिए कोई असुविधा की बात नही रही , बैग से पानी का बोतल निकाल कर दो घूँट पानी पीकर एक तरफ रख दी । मैं चाय ज्यादा पीती थी अक्सर ट्रेन में भी कई कप पी लेती हूं । चाय खरीद ली हाथ मे लेकर आराम से खिड़की की तरफ बाहर का दृश्य देखने लगी । बहुत मनोरम आँखों को सुकून देने वाली हरियाली संगीत भर रही थी । ट्रेन अब रफ्तार से चल रही थी । चाय पीकर एक लंबी सांस लेकर फिर अपनी बर्थ पर लेट गई । ट्रेन कटनी ,सतना , मैहर , शहडोल आदि पहाड़ी क्षेत्रों से गुजरती हुई तेज रफ्तार से समय से यात्रियों को पहुँचनाने के दौड़ में गुजर रही थी । इन पहाड़ी क्षेत्रों को देखकर मन में एक प्रकार की उत्सुकता होती कि यही मैं भी इन पहाड़ों के बीच रच बस जाऊं यही की हो जाऊं असीम शांति चारों तरफ फैली हुई यहाँ से वापस न जाना हो । इसी शोरगुल से हृदय भरा था । बिलासपुर पहुंचने में अभी घँटों दूरी तय करनी थी । ट्रेन भोर में स्टेशन पहुंचाएगी । यह सोच कर मैं सोने का उपक्रम करने लगी लेकिन नींद कही भी नही बाहर से चेहरे पर न कोई खुशी न कोई उत्कंठा थी । कई स्मृतियां बहुत सारी बचपन की यादों के साथ लौटाने जैसी थी । इन स्मृतियों में पापा का इतनी जल्दी चले जाना हम सबसे दूर इस असहनीय पीड़ा से मेरा रोम -रोम व हृदय द्रवित हो उठा । आँखों से आंसू बहने लगे चादर से पूरे शरीर को ढक ली , बर्थ पर चाहकर भी रो नही सकती थी। इन चमचमाती सड़कों और तेज रोशनी से जगमगाती महानगरीय जीवन को छोड़कर पापा दूर एक छोटे से गांव में अपना निवास स्थान बनाया । उनका समूचा जीवन फैजाबाद , लखनऊ , इलाहाबाद , कानपुर , बनारस जैसे शहरों में बीता । लेकिन इन शहरों में कही भी रमे नही जिंदगी की आपाधापी में उन्हें लोगों की करुणा भूख , और बेघर लोगो की चिंता ने उनके जीवन को सादा व सरल बना दिया । कभी अपने लिए उन्होंने कोई शौक नही पाले न ही किसी से कुछ कहा ।

बिलासपुर मेरा आना -जाना अपनी जीविका के कारण होने लगा था । स्टेशन काफी साफ-सुथरा व शांति यहाँ मैं घण्टों प्रतीक्षा हाल में बैठ कर दूसरी ट्रेन की इंतजार में रहती । प्लेटफार्म पर जाकर एक कोने पर लगी बेंच पर बैठती जहाँ मैं पहली बार पापा के साथ बिलासपुर में यूनिवर्सिटी में इंटरव्यू के लिए आई थी । वापसी में सारनाथ ट्रेन की प्रतीक्षा में पापा और मैं बिलासपुर स्टेशन पर लगभग दो घण्टे तक बैठे रहे और खूब सारी बातें करते रहे । मैं अपने इंटरव्यू से संतुष्ट नही थी मुझे पता चल गया था कि मेरा सलेक्शन नही होगा ये चिंता मेरे चेहरे पर साफ झलक रही थी । पापा इससे परिचित हो गए थे फिर उन्होंने कहा कि ,’यहां नही होगा तो कही और होगा इतनी जल्दी नही घबराना चाहिए । तुम्हारा काम सिर्फ इंटरव्यू देना था ‘ मुझे थोड़ी सी तसल्ली मिली । कुछ दिन बीते फिर से बिलासपुर आना हुआ इस बार मैं भाई के साथ आई फिर मैं यहां की हो गई मेरी जीविका का सोत्र बन गया । दैनिक रूप से धीरे-धीरे अपने कार्यो में व्यस्त होने लगी थी अचानक कोरोना का दौर आ गया अकेली घर से दूर पापा की चिंता , वे मुझे लगातार फोन पर साहस देते रहते थे । मोबाइल फोन पर हमेशा लोगो का साथ व विश्वास बने रहने का आश्वासन मिलता रहा जिससे मेरी हिम्मत बनी रही । जिस घर मे किराए पर रहती थी उन लोगो का साथ व घर जैसा वातावरण मुझे मुहैया था । भैया बाहर जाते तो फल, सब्जी ,दवा आदि मेरा भी ले आते उनके बच्चे अक्सर मेरे पास रहते कहते रहते दीदी चिंता मत करो हम सब आपके साथ है । मुझे कही जाना नही पड़ता था । यह सब बातें मैं पापा को अक्सर फोन पर बताती रहती ,यह सुनकर उनकी चिंता कुछ कम हुई । इधर कोरोना की वैक्सीन और बचाव के कारण कुछ असर धीरे -धीरे कम होने लगा । सामान्य जीवन पटरी पर आने लगा । जुलाई माह में कालेज की छुट्टी होने पर मैं घर चली गई । इस बार घर पर जाने पर पापा सबसे पहले घर के मेन दरवाजे पर प्रतीक्षा करते हुए मिले । बहुत ही खुश व बिलासपुर व कालेज आदि के साथ यहां लोगो के बारे में ढ़ेर सारी बाते हुई । यहां का भोजन ,रहन-सहन व लोगो के बारे में जानकर उन्हें अच्छा लगा व खुश होने के साथ ही निश्चिंत भी हो गए कि बेटी जहां रहती है वह जगह ठीक है चिंता करने की कोई बात नही है उनकी चिंता भी जायज थी । अक्सर जब पापा अपने मित्रों से जब बात करते तो मेरे बारे बताते रहते थे यह मुझे तब पता चला जब अचानक हम लोगो से दूर चले गए । अगस्त माह मेरे लिए एक भयानक हादसा लेकर आया जिससे हमारा परिवार दूर -दूर तक परिचित नही रहा ।जब पापा पूरे परिवार को छोड़ कर इस संसार से चले गए । किसी को विश्वास नही हो रहा था इतना कम समय में और मैं भी इस हादसे के बाद भयभीत सी हो गई । पापा को क्या हुआ ?

अभी तो यही बैठे थे और बात भी हुई इक्कीस अगस्त को पापा हमेशा की तरह अपने सारे काम निपटा रहे थे उस दिन हल्की सी बारिश और दिन शनिवार बारिश की वजह से कोर्ट नही गए। बाद में उन्होंने बताया आज जाने का मन नही हो रहा है । वह समय व उस मनहूस सांझ का जब सब अपने-अपने कामों में व्यस्त थे । कोई नही जानता था आज आने वाला क्षण हम सब भाइयों के लिए कितना मनहूस होगा । बाइस अगस्त सब कुछ खत्म सा हो गया हम लोग समझ नही पा रहे थे । डॉक्टरो के बताए गए वाक्य कानो में गूंज रहे थे । पापा कभी अंग्रेजी दवाओं को भूलकर नही लाते थे न सेवन करते थे । गिलोय को सुबह गर्म पानी के साथ पीते थे । उनकी जीवन शैली सब सुचारू रूप से ठीक थी कभी बीमार नही हुए थे कि हम लोग थोड़ा सा सतर्क हो जाएं अगस्त माह उस शाम को ब्रेनहेमरेज व ब्लडप्रेशर अधिक बढ़ जाने की वजह से हृदयाघात भी हो गया । यह सब देखकर हम भाइयों को कुछ भी समझ नही आ रहा था । मैं खुद ठगी व असहाय सी । कितना सबकुछ अपने जीवन मे लेकर चल रहे थे । जो कुछ भी समाज मे दीन दुःखियों के दुःख को देखते तो उनके दुःख को आत्मसात कर हर सम्भव सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे । यह सब सोचते हुए ट्रेन बिलासपुर जंक्शन पर पहुंच गई आंखों में आंसू डबडबा आई । ट्रेन से उतर कर उसी बेंच पर बैठ गई और दूसरी ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगी । प्लेटफार्म नम्बर एक की बेंच पर पापा के वापस आने की आस लिए दूसरी ट्रेन से मैं अपने गंतव्य के लिए रवाना हो गई । पीछे मुड़कर देखी तो खाली सिर्फ बेंच ,आज भी जब भी बिलासपुर जाती हूँ वह बेंच मुझे वहां पापा के होने का एहसास दिलाता है । एक आस व उम्मीद के साथ …….
खुशी एक तरफा होती है
जो आती है ,लेकिन ठहरती नही
रुकती नही,
एक स्पर्श की भांति
कानों में गुनगुना जाती है
और कहती है
यही आस-पास ।
देखो मैं तुम्हारे ही साथ हूँ
देखों जहाँ में ,
जीवन मे दुःख राहत भरती है
फिर कहती, मैं प्रतिपल नही हूँ ।
पर हूँ , कही नहीं
तू क्यों है उदास तू चल मैं मिलूँगी
मेरा निश्चित नहीं
आ मेरे साथ , आ मेरे पास ।

 ----डॉ० आकांक्षा मिश्रा