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‘सर्जनपीठ’ और ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित बौद्धिक परिसंवाद

जीवन जीने की कला सिखाती हिन्दी

‘भाषारस-गागरी’ समारोह के अन्तर्गत पिछले तीन दिनों से ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज में आयोजित हो रहे विविध कार्यक्रमों का समापन १६ सितम्बर के बौद्धिक परिसंवाद-कार्यक्रम ‘पठन-पाठन में हिन्दी-भाषा की उपयोगिता और महत्ता’ से हो गया।

शोधच्छात्र अवनेन्द्र पाण्डेय ‘रसराज’

आरम्भ में, शोधच्छात्र अवनेन्द्र पाण्डेय ‘रसराज’ ने हिन्दी का गरिमा-गान किया, “हिन्दी तन है मन है हिन्दी हिन्दी जीवन सुमन हमारा। सौम्य सौख्य सौहार्द है हिन्दी हिन्दी भारत-भूषण सारा।”

वरिष्ठ पत्रकार, विचारक तथा ज्योतिर्विद् रमाशंकर श्रीवास्तव

मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार, विचारक तथा ज्योतिर्विद् रमाशंकर श्रीवास्तव ने कहा, “पठन-पाठन में हिन्दी भाषा की उपयोगिता और महत्ता हिन्दीभाषियों के लिए उतना ही आवश्यक है जितना मानव-जीवन के लिए आक्सीजन। प्रकृति-प्रदत्त ऑक्सीजन जिस तरह हमारी जीवनरक्षा करती है, उसी तरह माँ के गर्भ से ही हमारी मातृभाषा भी सामाजिक, ऐतिहासिक तथा भौगोलिक आवश्यकताओं के प्रति हमारे ज्ञान-सुषुम्ना को उद्वेलित करती है, परिणामत: जन्म लेते ही हम तुतलाते हुए ‘अ, उ, औ’ का उच्चारण करने लगते हैं। यह शब्द सिर्फ़ हिन्दी भाषी शिशु का नहीं होता, अपितु विश्व के सभी शिशुओं-द्वारा उच्चारित किया जाता है। यह हमारा सौभाग्य है कि हम ऐसी भाषा के भाषी हैं, जो सिर्फ़ विज्ञानी नहीं, अपितु गणितीय भी है, साथ ही उच्चारण और लेखन में भी कोई अन्तर नहीं है। ऐसी स्थिति में, यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि हमारे जीवन में पठन-पाठन के लिए हिन्दीभाषा उपयोगी ही नहीं, आवश्यक भी है।”

साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी

साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने बताया, “किसी भी देश की भाषा उसकी पहचान और उन्नति का मार्ग होती है। हिन्दीभाषा ने यही काम भारत के लिए करते हुए, पूरे देश को एकता के बन्धन में बाँध रखा है। आज विश्व में किसी भी भाषा का अनुवाद हिन्दी में करके अथवा हिन्दीभाषा का अनुवाद दूसरी भाषाओं में करके, हिन्दी को प्रयोजनमूलक बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है। हम कह सकते हैं कि हिन्दी स्वयंसिद्ध भाषा है और इसका अपना विज्ञान है, इसीलिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शनै:-शनै: हिन्दी में काम शुरू कर रही हैं, जो कि एक शुभ संकेत है।”

समारोह-संयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

समारोह-संयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “हिन्दी एक जीवन्त भाषा है। इसका प्रभाव हमारे जीवन से मरण तक का है। हिन्दी हमें परिमार्जित और परिष्कृत करती है। हिन्दी देश-देशान्तर की अनेक भाषा-बोलियों तथा वहाँ की संस्कृति को आत्मसात् करने और आदान-प्रदान करने में शताब्दियों से अपनी भूमिका का निर्वहण करती आ रही है। उत्तर-भारत के विद्यार्थी हिन्दी को ‘दाल-भात का कौर’ समझते आ रहे हैं। यही कारण है कि अपनी ऐसी ही लापरवाही के कारण एशिया के सबसे बड़े शैक्षिक प्रतिष्ठान ‘उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ की हाइस्कूल और इण्टरमीडिएट की परीक्षाओं में प्रतिवर्ष लगभग १५ लाख विद्यार्थी अनुत्तीर्ण होते आ रहे हैं; परन्तु इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं। हमारे अधिकतर प्रतियोगी विद्यार्थी हिन्दी-भाषा में अतीव कठिनाई का अनुभव करते आ रहे हैं और उसे दूर कर पाने में असमर्थ भी दिखते हैं। ऐसा इसलिए कि उन्होंने हिन्दी की महत्ता को ‘सस्ते’ में ले लिया। हिन्दी तो जीवन जीने की कला सिखाती है।”

शिक्षिका मधुबाला पाण्डेय

शिक्षिका मधुबाला पाण्डेय ने कहा, “आज हमारी राजभाषा हिन्दी विश्व-स्तर तक पहुँच चुकी है तो हमारे मनीषियों के अथक प्रयास से ही हो पाया है। हिन्दी भाषा को विज्ञान की भाषा बनाने के लिए हमें भारतेन्दु हरिश्चन्द- जैसा बनना होगा और तभी हमारी हिन्दी भाषा समृद्धि हो पायेगी।”

वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र पाण्डेय

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र पाण्डेय ने कहा, “अनेक अन्तर्विरोध के बावुजूद अपनी समृद्धि को प्राप्त करते हुए हिन्दी अब पूरे देश की भाषा बन चुकी है। उत्तर-भारत समेत दक्षिण के भी सभी राज्यों में हिन्दी ने अपना एक स्थान बना लिया है। पठन-पाठन में तो अब आम प्रचलन में हिन्दी का उपयोग तेज़ी में किया जा रहा है। हिन्दी- भाषा का देश को एकसूत्र में पिरोने में विशेष योगदान रहा है। छोटी कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा में भी हिन्दी का महत्त्व बढ़ गया है। हिन्दी जितनी ही मीठी और सरल भाषा मानी जाती है, भाषाविज्ञान की दृष्टि से उतनी ही कठिन। हमारे देश के अंग्रेजीदा लोग को भी हिन्दी की महत्ता को आत्मसात् करते इसकी उपयोगिता को बढ़ाना होगा, तभी इसे उचित स्थान मिल पायेगा।”

अधिवक्ता डॉ० प्रतिभा सिंह

अधिवक्ता डॉ० प्रतिभा सिंह के अनुसार, “किसी देश के प्रत्येक नागरिक को उसकी क्षमता तथा योग्यता के अनुसार देश के विकास में भागीदार बनने का शुभ अवसर प्राप्त हो, इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उस देश की एक राष्ट्रीय भाषा हो, जिसमें वहाँ का प्रत्येक नागरिक अपने भाव को व्यक्त कर सके। हिन्दी भाषा का महत्त्व इसलिए आवश्यक है कि बिना हिन्दी-, भाषा के विकास की धुरी कुछ सीमित व्यक्तियों तक घूमती रहेगी और देश का अधिकांश नागरिक किसी प्रकार के विकास से दूर रहेगा।”

कलाविद् नीतू सिंह

कलाविद् नीतू सिंह ने कहा, “हिन्दी एक ऐसा माध्यम है, जहाँ समस्त व्यावहारिक गतिविधियाँ और आपसी सौहार्द इसी भाषा के माध्यम से उपस्थित होता है और सबसे अहं बात, जब अतिथि घर क़ब्ज़ा करने लगे तब उसे उसका रास्ता दिखाना आवश्यक हो जाता है इसी प्रकार अंग्रेजी के साथ भी होना चाहिए। किसी भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है; परन्तु विदेशी भाषाओं को अपनी व्यावहारिक गतिविधियों में लाना अत्यन्त जटिल समस्या है, अतः सजग होकर हिन्दी की सम्प्रेषणीयता को ग्रहण करें।”

प्रतियोगी विद्यार्थी जगन्नाथ शुक्ल

प्रतियोगी विद्यार्थी जगन्नाथ शुक्ल ने कहा, “वैसे तो हमारे देश में एक वैभवशाली भाषिक परम्परा रही है; किन्तु हिन्दी की महत्ता का अपना विशेष कारण है। राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी का चुनाव करने का वास्तविक कारण इसकी सहज ग्रहणशीलता है। पठन-पाठन के स्तर पर हिन्दी एक भाषा ही नहीं है, अपितु एक माध्यम है, जिससे आधी से अधिक आबादी की बोधगम्यता सहज और सरल हो जाती है। हिन्दी एक ऐसी भाषा है, जिसे थोड़े प्रयास में समझा जा सकता है और प्रयोग के स्तर पर सीखा जा सकता है। यह विशेषता विश्व की किसी अन्य भाषा में नहीं है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमारे देश में कई पाठ्यक्रम हिन्दी में अनुपलब्ध हैं, जो कि हमारी भाषा का अपमान है और इच्छुक अध्येताओं के मार्ग की प्रमुख बाधा भी है, अतएव आवश्यकता है कि राष्ट्रभाषा का सीमांकन न किया जाये, अपितु इसकी अजस्र धारा को प्रवहमान बनाये रखा जाये।”

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