केन्द्र-शासन के ‘मृत्युदण्ड’ की व्यवस्था का स्वागत है

 

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


इन दिनों जिस अमानवीयता का परिचय देते हुए, निर्दोष, निरपराध तथा निश्छल बालिकाओं के साथ शारीरिक दुष्कर्म किये जा रहे हैं और साक्ष्य मिटाने के लिए उनकी निर्मम हत्याएँ की जा रही हैं, उनके आलोक में वर्तमान केन्द्र-शासन ने बलात्कारियों के लिए ‘मृत्युदण्ड’ का जो प्रविधान किया है, उसका एक स्वर में हम स्वागत करते हैं; क्योंकि बिना कठोरतम दण्ड की व्यवस्था किये उक्त घटनाओं पर नियन्त्रण कर पाना सहज नहीं है।
निस्सन्देह, अब वैसी क्रूररतम कृत्य करनेवालों पर ‘मृत्युदण्ड’ के भय की तलवार लटकी रहेगी, जो मनोविज्ञानस्तर पर उन पर प्रभावी होता रहेगा। इसमें यदि ‘अंग-भंग’ (हाथ-पैर काट लेना) करने का एक और प्रविधान जुड़ जाता तो यह निर्णय धारदार हो जाता; क्योंकि दण्डभोगी के कटे हाथ-पैर वैसी मानसिकता के अपराधियों के मन को विचलित कर सकते हैं। फिर भी जहाँ ‘कुछ’ नहीं था, वहाँ ‘बहुत-कुछ’ अब दिखेगा, यह एक विशेष प्रकार की दण्ड-व्यवस्था को रेखांकित करेगा। इसका श्रेय विशेषत: उत्तरप्रदेश के मुख्य मन्त्री आदित्यनाथ योगी को जाता है, जिन्होंने वर्तमान केन्द्रिय मन्त्रिपरिषद् के पास ‘मृत्युदण्ड’ का प्रस्ताव प्रेषित किया था और तत्पश्चात् देश के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए, जिन्होंने देश की जनता की व्यथित और आक्रोशित भावभूमि का समादर किया है।
पिछले चार वर्षों में वर्तमान केन्द्र-शासन के निर्णय का यह ‘एकमात्र’ ऐसा जनमंगलकारी निर्णय कहा जायेगा, जिसका प्रभाव और परिणाम ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ में से एक ‘बेटी बचाओ’ कार्यक्रम के क्रियान्वयन के रूप में दिखेगा।

यह भी विचारणीय है कि ‘भारतीय दण्ड संहिता’ के अन्तर्गत जघन्य कृत्यों के लिए पर्याप्त दण्ड की व्यवस्था है; परन्तु उन पर ‘रिश्वत’ और ‘राजनीति’ के ‘राहू-केतु’ ग्रहण लगा देते हैं, इसलिए मात्र ‘कठोरतम’ दण्ड की व्यवस्था करना पर्याप्त नहीं है; प्रत्युत दण्ड का समुचित दिशा में स्वस्थ प्रक्रियान्तर्गत क्रियान्वयन कराना महत्त्व का विषय है। हम यदि इस ‘मृत्युदण्ड’ का समीक्षा के स्तर पर विवेचन करें तो किसी भी अवस्था की नारी के साथ बलपूर्वक किये गये शारीरिक दुष्कृत्य को ‘मृत्युदण्ड की परिधि’ में रखा जाना चाहिए था।

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एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि जब ऐसे संवेदनशील विषय पर केन्द्र-शासन कोई निर्णय करता है तब उससे पूर्व ‘सर्वदलीय बैठक’ आमन्त्रित कर, सम्बद्ध विषय पर सभी के विचार सुने जाने चाहिए थे, फिर सर्वसम्मति से किसी निर्णय की स्थिति में आते तो वह ‘लोकतान्त्रिक’ निर्णय कहा जाता। इससे तो ‘राजनीतिक’ लाभ प्राप्त करने की ध्वनि निकलती है। यह ऐसा विषय है, जिस पर कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं दिखता; साथ ही केन्द्रिय शासन की महत्ता भी बढ़ जाती।

अब, जब ‘मृत्युदण्ड’ की व्यवस्था की गयी है तब विपक्षियों का यह कहना कि ऐसा निर्णय विलम्ब में क्यों आया है, उचित नहीं कहा जायेगा; क्योंकि सत्तापक्ष की ओर से प्रतिप्रश्न आ सकता है : आपने अपने सत्ताकाल में ‘मृत्युदण्ड’ की व्यवस्था क्यों नहीं की थी? क्या तब वैसे अपराध नहीं किये जाते थे? इस प्रकार संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

बुद्धिमत्ता यह है कि ‘मृत्युदण्ड’ के प्रविधान को निष्ठापूर्वक लागू कराया जाये और ‘आरोपी-पक्ष’ को न्याय दिलाया जाये।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २१ अप्रैल, २०१८ ई०)

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