सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

जब बिहार में गांँधी के हरिजन मारे जा रहे थे, तब ये विचारक कहाँ थे ?

प्रेम कुमार मणि-


कबीर ने कहा था -साधु न चलै ज़मात . साधु जनो के ज़मात नहीं होते . जैसे सिंहो के लेहड़े या हंसो की पाँत नहीं होती .
लेकिन बिहार में गाँधी पंथी साधुओं (विचारकों ) का मेला लग रहा है .गाँधी ने स्वयं को कभी विचारक नहीं माना . वह कर्मण्य थे – कर्मवीर . दमित राष्ट्र को उन्होंने वाणी दी और विदेशी सत्ता के खिलाफ जंग छेड़ा . अनगढ़ भारतीय राष्ट्र को यथासंभव आधुनिक स्वरूप दिया . पश्चिमी राष्ट्रवाद से पृथक उसमे ओरिएण्टल बेल -बूटे उकेरे . उसे नैतिक और जवाबदेह बनाया . उनमे जार्ज वाशिंगटन ,गैरीबाल्डी और कमाल पाशा के अक्श थे . लेकिन वे विचारक की परंपरा में नहीं हैं . भारतीय बुर्जुआ तबके ने उन्हें विचारक घोषित कर उनके नाम पर अपने लिए अभयारण्य बना रखा है . विचारक विचार रखते हैं , गाँधी प्रयोग करते थे – सत्य के प्रयोग .  गाँधी पर सोचता हूँ ,तब निष्कर्ष पाता हूँ कि एक जातक ,जो २ अक्टूबर १८६९ को पैदा हुआ ,पढाई में साधारण , पेशे में फिसड्डी , गृहस्थी बहुत सुखी नहीं . बाल -बच्चों में से भी किसी ने सितारे नहीं तोड़े . (एक तो बागी ही रहा ) . आधी ज़िन्दगी अधनंगा रहा . जिसके बारह साल जेल में गुज़रे . बीवी दवा के बिना मरी और खुद गोली खाकर मरा .
यह एक संत का जीवन है . संतो के साथ ट्रेजेडी हुई कि उनके नाम पे पंथ और मठ बन गए . कबीर के नाम पर भी यह हुआ और गाँधी के नाम पर भी . गाँधी के नाम की कंठी -जाप कर पेट पालने वालों को विचारक नहीं कहा जाना चाहिए .  लेकिन खबर है कि बेरासी विचारक बिहार आ रहे हैं . ये राजसत्ता से भिड़ने नहीं ,जुड़ने आ रहे हैं . इन में कोई हरिजन , किसान ,मजूर नहीं है . सुजला -सुफला लोग हैं . मैं पूछना चाहूंगा ,जब बिहार में गांघी के हरिजन मारे जा रहे थे ,तब ये विचारक कहाँ थे ? सभव है दलितों के कातिल उनके लिए फूल के गुच्छे लिए खड़े हों .