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‘न्याय’ और ‘न्यायालय’ के नाम पर देश के साथ आँखमिचौली खेल रहे हैं, ‘न्यायाधीश’!

'मुक्त मीडिया' का 'आज' का सम्पादकीय

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डी० जे० के प्रयोग को प्रतिबन्धित कर जनसामान्य को ध्वनि-प्रदूषण से बचाने का प्रयास किया था।

खेद है! देश के शीर्षस्थ न्यायालय उच्चतम न्यायालय की ओर से उक्त उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध आदेश पारित कर उच्चतम न्यायालय के सम्बद्ध न्यायाधीशों ने अपनी परतन्त्र मनोवृत्ति का ताल ठोंककर परिचय देते हुए, घिनौने ‘इतिहास’ को दोहरा दिया है।

प्रश्न है, काँवड़ियों की काँवड़-यात्रा के समय कानफाड़ू वाद्ययन्त्र ‘डी० जे०’ पर से रोक हटाने का निर्णय किस आधार पर किया गया है? इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने जब ‘डी० जे०-वादन’ को प्रतिबन्धित किया था तब सुविचारित ढंग से विचार करने के बाद प्रतिबन्ध लागू करनेवाले न्यायाधीशों के निर्णय पर ‘अपना’ निर्णय थोपकर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने अपने ‘अधिनायकत्व’ का परिचय नहीं दिया है?

काँवड़ियों के साथ जो प्रतिष्ठान ‘डी० जे०-वादन’ करते दिखेंगे, उनके बीच कौन अधिकारी अथवा न्यायाधीश जाकर जाँच करेगा कि कौन-सा डी० जे० पंजीकृत प्रतिष्ठान का है और कौन-सा नहीं है? ऐसे में, उच्चतम न्यायालय का यह तर्क कि वही डी० जे० बजाये जायेंगे, जो पंजीकृत प्रतिष्ठान के होंगे। क्या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का यह मालूम नहीं– अधिकतर डी० जे० अपंजीकृत हैं? फिर प्रश्न है, देश का कौन-सा कार्यालय इसकी जाँच का दायित्व लेगा?

प्रथम दृष्ट्या इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का जो निर्णय लोकहित में था, उसको पलट कर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने अपने ‘सुप्रीम’ होने का बोध कराया है, जिसकी जितनी भी निन्दा की जाये, कम है।

देश के नागरिकों से लोकतन्त्र का अस्तित्व है और लोकतन्त्र का अन्तिम स्तम्भ ‘न्यायपालिका’ है, इसलिए यदि न्यायपालिका का कोई भी आदेश अथवा निर्णय लोकहित के विरुद्ध दिखता है तो हम समस्त नागरिकों का कर्त्तव्य बन जाता है कि उसकी निन्दा करें।

इससे एक बात साफ़ हो जाती है कि हमारे देश की न्यायपालिका ग़ुलामी की ओर बढ़ रही है। इस तरह के आये-दिन निर्णय किये जा रहे हैं, जिससे न्यायालय एक-दूसरे पर प्रभावी होते दिखते आ रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय के जिन न्यायाधीशों ने इलाहाबाद के स्वस्थ निर्णय को बदलकर अपना निर्णय थोपने का आदेश जारी किया है, उनसे हमारा अनुरोध है कि डी० जे०-वादन पर लगाये गये प्रतिबन्ध को हटायें नहीं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जुलाई, २०२१ ईसवी।)