आंखों देखी : इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल/अपर प्राइमरी स्कूल फर्स्ट, अजुहा जैसे विद्यालयों का कौन सुधारेगा सिस्टम

आंखों देखी

स्थान– इंग्लिश मीडियम स्कूल प्राइमरी स्कूल/अपर प्राइमरी स्कूल फर्स्ट, अजुहा, विकास खंड- कड़ा, जनपद- कौशांबी, उत्तर प्रदेश

विद्यालय का समय- सुबह 7 बजे से 11 बजे तक, समय- सुबह 7.47 बजे

स्थिति– विद्यालय मे झाड़ू नही लगी । कुछ बच्चे कैंपस के अंदर घूम रहे हैं । कुछ अपनी-अपनी कक्षाओं मे सफाई कर रहे,रसोईया रसोई के बाहर झाड़ू लगा रही । विद्यालय गेट के ठीक सामने बरामदे मे दो शिक्षिकाएं कुर्सी पर बैठी अपने-अपने एंड्रायड फोन पर तल्लीन थीं । कुछ अध्यापक अध्यापककक्ष में कुर्सियों पर बैठे और कुछ खड़े आपस मे गुफ्तगू कर रहे थे ।

कुछ ऐसा ही नजारा प्रतिदिन का रहता है । ऐसे में सरकार तो गरीब बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा व्यवस्था देने के लिए जनता के पैसे से शिक्षा के लिए बजट बढ़ाकर इंग्लिश मीडियम स्कूल भी खोल दिया । शिक्षक-शिक्षिकाओं की व्यवस्था भी कर दी और उसकी जिम्मेदारी खत्म !

लेकिन वर्ष मे ऐसे एक-एक विद्यालयों मे जनता की खून-पसीने की कमाई से चुकाए गए कर के करोड़ों रुपये खर्च करने के पश्चात भी इन विद्यालयों से क्या हासिल हो रहा?इतना रुपया पानी मे जा रहा या सदुपयोग हो रहा इसकी सुधि कौन लेगा?

सबसे बेशर्म और नीच तो वे लोग हैं जो एकबार सरकारी नौकरी मिलने के बाद अपने दायित्वों को भूलकर सिर्फ सरकार से वेतन लेना ही अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते हैं । ऐसे मे उनकी सुधि लेकर उन्हे बाहर का रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी किसकी? जब देश में बेरोजगारी सुरसा की तरह मुंह फैलाए खड़ी हो तो ऐसे मक्कारों को रोजगार पर रखने का क्या औचित्य? जो काम न करे उसे बाहर और जो काम करना चाहे उसे अंदर करने की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं है?

कहने के लिए तो सरकार ने समाज के गरीब वर्ग के बच्चों को भी वही संसाधन उपलब्ध करा दिए जो समाज के आर्थिक रुप से सक्षम वर्ग के लिए उनके निजी खर्च पर उपलब्ध हैं ताकि उनके साथ सामाजिक अन्याय न होने पाए । वे भी समाज मे बराबरी के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सकें । लेकिन ऐसी परिस्थितियों में समाज का वह गरीब भी जो पेट पालने की स्थिति में हो वह ऐसे विद्यालयों मे अपने बच्चों को भेजकर उनके भविष्य को दांव पर लगाना चाहेगा? हरगिज नहीं । बल्कि वह अपना और अपने परिवार का पेट काटकर अपने बच्चों को कम खर्च वाले ही उन प्राइवेट विद्यालयों मे भेजेगा जहां शिक्षा का स्तर कुछ तो ठीक हो। लेकिन समाज के उन तबकों के बच्चों का क्या होगा जिनके लिए दो वक्त की रोटी भी मुश्किल है? उन बच्चों के साथ सरकार कैसे करेगी न्याय?

इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन? कौन सुधारेगा सिस्टम को? क्या यह सरकार की जवाबदेही नही?

क्या इस बारे मे जिम्मेदार अधिकारी कौशांबी के बेसिक शिक्षा अधिकारी या जिम्मेदार जनप्रतिनिधि माननीया अनुपमा जायसवाल जी या फिर माननीय योगी आदित्यनाथ जी कुछ कहेंगे? बात मात्र एक विद्यालय की नहीं बल्कि बात अव्यवस्था की है और वर्षों से जमी इन अव्यवस्थाओं के खिलाफ कठोरतम निर्णय लेकर अव्यवस्थाओं को सुव्यवस्थाओं मे बदलने के लिए भी जनता ने इस सरकार को प्रचंड जनादेश दिया था अन्यथा सरकार बदलने की जरूरत ही क्या है?

विजय कुमार✍️✍️

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