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राममन्दिर के लिए आन्दोलन करनेवाले लालकृष्ण आडवाणी की उपेक्षा क्यों?

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

रथयात्रा से सोमनाथ से ‘अयोध्या’ की यात्रा करनेवाले लालकृष्ण आडवाणी और उसके प्रमुख पात्र डॉ० मुरलीमनोहर जोशी को अभी तक भूमिपूजन में उपस्थित होने के लिए निमन्त्रणपत्र नहीं भेजा गया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी के महासचिव चम्पत राय ने अपने नाम को सार्थक करते हुए; झूठ बोलते हुए, २ अगस्त को सार्वजनिक किया था कि लालकृष्ण आडवाणी और डॉ० मुरलीमनोहर जोशी को अयोध्या आने का आमन्त्रण दिया गया है।

स्मरणीय है कि भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ राजनेता लालकृष्ण आडवाणी ने २५ सितम्बर, १९९० ई० से ‘सोमनाथ से अयोध्या तक’ की लगभग १० हज़ार किलोमीटर की यात्रा आरम्भ की थी, तब उस यात्रा के दौरान दो नारे लगाये जा रहे थे :– “बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का” और “रामलला हम आयेंगे-मन्दिर वहीं मनायेंगे।” आडवाणी की रथयात्रा जब समस्तीपुर पहुँची थी तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमन्त्री लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी को बन्दी बनवा लिया था। इस कारण आडवाणी की रथयात्रा के उद्देश्य भी थम गये, फलत: आडवाणी अयोध्या नहीं पहुँच सके थे।

आश्चर्य है कि राममन्दिर-आन्दोलन जब आरम्भ हुआ था तब नरेन्द्र मोदी की कहीं कोई पहचान नहीं थी और वही आज ‘नायक’ बन बैठे हैं। सच, “जिसकी लाठी-उसकी भैंस” चरितार्थ की जा रही है। उस आन्दोलन से जुड़े प्रमुख राजनेताओं की उपेक्षा करते हुए, राममन्दिर न्यास के आयोजकगण क्या सिद्ध करना चाहते हैं? राममन्दिर-निर्माण के सन्दर्भ में बावरी मस्जिद-ध्वंस के समय अपार हिन्दूभक्तों का प्रतिनिधित्व लालकृष्ण आडवाणी और डॉ० मुरलीमनोहर जोशी ही कर रहे थे और वर्षों तक उनपर मुक़द्दमा भी चला है; परन्तु भूमिपूजन के लिए जिन व्यक्तियों को प्रमुखता के साथ स्थान मिलना चाहिए था, उन्हें अभी तक आमन्त्रित ही नहीं किया गया है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३ अगस्त, २०२० ई०)

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