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भारत के सैन्यतन्त्र का राजनीतीकरण क्यों?

सर्जिकल स्ट्राइक' का 'वितण्डावाद'!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


प्रश्न हैं– भारतीय सेना के ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का वीडियो ‘सार्वजनिक’ किसने और क्यों किया है? क्या भारतीय सेना के सारे सैनिक और शीर्षस्थ अधिकारी इतने अविश्वसनीय, दुर्बल, शिथिल तथा बौने पड़ चुके हैं, उन्हें ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का सुबूत देना पड़ रहा है? उस समय उनकी चेतना कहाँ चली गयी थी, जब सत्तापक्ष की ओर से अकस्मात् विस्फोटक समाचार ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का राजनीतीकरण करते हुए, सार्वजनिक किया गया था और तब लोकतन्त्र के प्रतिनिधि राजनीतिक दलों और देश के नागरिकों की ओर से ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े किये गये थे?

देश के उच्चपदस्थ सैन्य अधिकारी इतना अवश्य समझ लें कि वे ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को प्रमाण के रूप में जितना अधिक प्रस्तुत करते रहेंगे, उसकी विश्वसनीयता और घटती जायेगी।

सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक किया अथवा नहीं किया था, इस पर सत्तापक्ष राजनीतिक लाभ लेनेवाला कौन होता है? क्या देश की सेना भी ‘भारतीय जनता पार्टी’ की है?
सेनाध्यक्ष कहते हैं— हमारे पास ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से भी बेहतर विकल्प हैं। प्रश्न है, उन विकल्पों को अण्डे देने की प्रतीक्षा में रखा गया है क्या? आये-दिन हमारे सैनिक मारे जा रहे हैं और सेनाध्यक्ष मात्र ‘बन्दरघुड़की’ दे रहे हैं। जो करना हो, करके दिखाओ; हमारे सैनिकों को मरवाओ मत!

जिस समय ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ अभियान को अन्तिम रूप देने और उसके परिणाम-प्रभाव को ‘राजनीतिक सोच’ के साथ सार्वजनिक किया गया था, उस समय सेना के गोपनीय प्रकोष्ठ के अधिकारी कहाँ आराम फ़रमा रहे थे? इससे ज़ाहिर होता है, हमारी सेना को स्वयं के शौर्य पर भरोसा नहीं है अथवा अब वह भी अपने कार्यों को सार्वजनिक कर, अपनी पीठ थपथपवाने का लोभ-संवरण नहीं कर पा रही है अथवा सत्तापक्ष के दबाव में है। यदि नहीं तो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की वीडियोग्राफ़ी कराकर ‘आज’ उसे सार्वजनिक करने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है, जबकि देश की जनता उसे भूल चुकी थी? क्या इसलिए कि कुछ ही माह-बाद कतिपय राज्यों के चुनाव और वर्ष २०१९ के लोकसभा चुनाव में वर्तमान सत्तापक्ष इसे चुनावी हथकण्डा बनाकर सुनियोजित तरीक़े से प्रतिपक्षी दलों को घेरना चाहता है; क्योंकि उसके ‘विकास’, ‘हिन्दुत्व’, ‘राममन्दिर’, ‘साम्प्रदायिक वैमनस्य’, दलित राजनीति’, ‘आरक्षण’, ‘पदोन्नति में आरक्षण’ ‘सवर्ण-विरोधी नीति’, ‘निजता-हनन्’ आदिक के चेहरे घृणित, समाजविभाजक तथा गृहयुद्ध-प्रेरक के रूप में अब सामने आ चुके हैं और अब वही सत्तापक्ष ‘मुद्दाविहीन’ है।

वस्तुस्थिति जो भी हो, सेना अपनी गोपनीयता ‘नंगी’ करने के लिए ‘स्वयं’ उत्तरदायी है। इस विषय को तो ‘सेना-न्यायालय’ में प्रस्तुत कर, ज़िम्मादार सेनाधिकारियों को कठघरे में लाना चाहिए; उनका ‘कोर्ट मार्शल’ करना चाहिए; साथ ही इस कुकृत्य को कर रहे मीडियावालों को भी न्यायालय में घसीटना चाहिए। इससे सेना अपनी विश्वसनीयता घटा चुकी है। सेना के अधिकारी इस तथ्य का उद्घाटन क्यों नहीं करते– किसके इशारे पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का वीडियो देश का समूचा मीडियातन्त्र आज ‘सत्तापक्ष का प्रवक्ता’ बनकर कर प्रदर्शित कर रहा है? उन दिनों जब देश राजनीतिक बयानबाज़ी के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का प्रमाण माँग रहा था तब वे तथाकथित मीडियावाले और सैन्य अधिकारी कहाँ छुप गये थे?

कहीं ऐसा तो नहीं, इसे मीडियावालों को ख़रीदकर अथवा धमकी देकर उक्त वीडियो को अप्रत्याशित कार्यक्रम के रूप में उनसे प्रदर्शित कराया जा रहा है? जब आरम्भ में, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ समाचार को ‘नमक-मिर्च’ के साथ दिखाया जा रहा था तब उसका श्रेय स्वयं ‘नरेन्द्र मोदी’ ले रहे थे।

अब मैं यक्ष प्रश्न करता हूँ– ६३६ दिनों के बाद देश के मीडिया के ठीकेदार एक सुर में एक-जैसा ‘सरकारी तर्क’ प्रस्तुत करते हुए, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का वीडियो क्यों दिखा रहे हैं? यहीं एक और प्रश्न है— क्या भारतीय सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है? समझ में नहीं आ रहा है, हमारे सेनाधिकारी अपने मार्ग से भटक क्यों रहे हैं?
अब तो लगने लगा है कि वह ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नहीं, बल्कि ‘फर्जिकल स्ट्राइक’ था; क्योंकि ‘अकारण’ किसी विषय को ‘अज्ञात’ तथ्यों के साथ ज़रूरत से ज़्यादा तूल देकर प्रस्तुत करना-कराना यह सिद्ध करता है कि दाल में काला नहीं, अपितु समूची दाल ही काली है।

इन सारे वितण्डावादों से देश की सेना भी अविश्वसनीयता की परिधि में आती जा रही है। चीन, पाकिस्तान की दोगली रणनीति को विफल करने, संयुक्त राज्य अमेरिका की अवसरवादी राजनीति करने, पश्चिम एशियाई देशों और शेष दक्षिण-एशियाई देशों के साथ सामरिक उपायों पर संवाद कर, कूटनीतिक सम्बन्धों को व्याप्ति देने के विषय तथा अन्य सामरिक विषयों पर विचार करने में देश के सैन्य अधिकारी अपना समय और अपनी ऊर्जा क्यों नहीं लगा रहे हैं? ‘गड़े मुरदे’ को जितनी बार उखाड़ा जायेगा, वह ‘बैताल’ बनकर देश के प्रधानमन्त्री और शीर्षस्थ सैन्य अधिकारी के रूप में ‘दो विक्रमों’ के कन्धों पर बैठ जायेगा और प्रश्न करना आरम्भ कर देगा। अत: भारत की सेना को देश की निहायत घटिया ‘लोक-विरुद्ध’ राजनीति से दूर रख, उसे अपने निर्धारित दायित्व का निर्वहन करने दिया जाये, अन्यथा देश की जनता सैन्य अधिकारियों के सम्मुख हमेशा एक प्रश्न-प्रतिप्रश्नकर्त्ता के रूप खड़ी होती दिखेगी। सेना अपना कर्त्तव्य करती रहे; प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि सेना का ‘शौर्य’ ही हमारे लिए ‘अकाट्य प्रमाण’ है।

जय जवान-जय भारत।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३० सितम्बर, २०१८ ईसवी)