किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ होना चाहिए ?

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों की कर्जमाफी क्या हुई, कुछ लोगों की छाती पर सांप लोट गया है, इस सांप के डिस्को डांस करने की वजह कुछ और नहीं 2019 का टूटता ख्वाब है, क्यों कि अगर ऐसा नहीं है तो जो बीजेपी उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज माफ करने का वादा कर के सत्ता में आई थी वो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसानों की कर्जमाफी को पाप नहीं ठहराती, सुबह से शाम तक न्यूज चैनल्स पर इसके साइड इफेक्ट ना गिनाए जा रहे होते ।

ये बात सच है कि किसी भी तरह के कर्ज को माफ करने से बैंकों की कमर कमजोर होती है लेकिन जिन प्रदेशों में किसानों के राशन कार्ड तक गिरवी रखे हों, जहां अपना हक मांगने पर गोलियां मिली हों, वहां किसानों का कर्ज माफ करना मुझे गलत नहीं लगता है । मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज माफ किया है, ये वादा पहली बार नहीं किया गया था, इसके पहले तेलंगाना में TRS, कर्नाटक में बीजेपी और JDS, पंजाब में कांग्रेस, यूपी में बीजेपी ये वादा पहले भी कर चुकी है और यहां किसानों का कर्ज माफ भी किया जा चुका है, अलबत्ता इन्ही राज्यों की देखा देखी महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने भी कर्ज माफी की थी ।

उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु और कर्नाटक में जिन किसानों का कर्ज माफ हुआ है, उसका कुल योग 1 लाख 7 हजार 700 करोड़ है, जिसे आप राजकोषीय घाटा कह सकते हैं, पूर्व RBI गर्वनर रघुराम राजन ने चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर कहा है कि ऐसे चुनावी वायदों पर रोक लगाई जानी चाहिए, क्यों कि इससे बैंकों की कार्यप्रणाली पर गहरा असर होता है, बात बिल्कुल ठीक है और समझ में भी आती है लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता है कि अगर किसानों का कर्ज माफ करने से बैंकों की कमर टूटती है तो 26 मई 2016 को मोदी सरकार ने 2 साल पूरे होने पर जो विज्ञापनों पर छपवाए थे उस पर 1 हजार करोड़ रुपये क्यों खर्च किए गए ?

जिस देश में 450 करोड़ रुपए मंगलयान पर खर्च होते हैं वहां सरदार पटेल की मूर्ति बनवाने के लिए 3 हजार करोड़ क्यों खर्च किए गए ?

जिस देश की 70 फीसदी आबादी मेट्रो, लोकल, पैसेजेंर, जनरल क्लास में धक्के खाती हो वहां मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन के लिए 1 लाख 10 हजार करोड़ क्यों खर्च किए गए ?

जब अन्नदाता पर सूखा और ओलावृष्टि की मार का डर सता रहा हो और वो हर मिनट मौत को गले लगा रहा हो तब मोदी सरकार अपने 4 सालों के कार्यकाल में विज्ञापन पर 4 हजार 300 करोड़ रुपए क्यों खर्च करती है ?

जिस देश की कृषि विकास दर 2 फीसदी से भी नीचे हो, उस देश के प्रधानमंत्री के 84 देशों के दौरे पर कैसे 1 हजार 484 करोड़ रुपए खर्च कर दिए जाते हैं और ये जानकारी मैंने नहीं दी है, ये जानकारी खुद विदेश मामलों के राज्यमंत्री वीके सिंह ने राज्यसभा में दी थी ।

इतना ही नहीं अक्टूबर 2018 में RTI के जवाब में मिली जानकारी कहती है कि देश के सांसदों पर पिछले 4 सालों में नरेंद्र मोदी सरकार ने 20 अरब रुपए खर्च किए हैं यानि करीब 2 हजार करोड़ रुपए ।

ये वही सांसद हैं जिन्हें 50 हजार सैलरी, 2 हजार दैनिक भत्ता, 45 हजार संवैधानिक भत्ता, 45 हजार कार्यालय व्यय भत्ता, 15 हजार रुपए स्टेशनरी भत्ता, अपने सहायक रखने पर 30 हजार रुपए, पार्लियामेंट सेशन या किसी अन्य यात्रा पर जाने पर भत्ता, एक साल में 34 हवाई यात्राएं भी वो कर सकते हैं जिसमें उनके साथ उनकी पत्नी भी सिर्फ 25 फीसदी रुपए का भुगतान कर हवाई यात्रा कर सकती हैं, इतना ही नहीं 16 रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से गाड़ी की यात्रा का भत्ता भी मिलता है, 3 फोन की सुविधा मिलती हैं, हर साल 4 हजार किलोलीटर पानी और 50 हजार यूनिट बिजली सांसद कोटे में फ्री होती है, निजी गाड़ी खरीदने के लिए 4 लाख रुपए मिलते हैं लेकिन इस वाली रकम को उन्हे किश्तों में चुकाना होता है और इन सब सुविधाओं पर माननीय सांसद महोदय को किसी तरह का कोई इनकम टैक्स नहीं देना होता है ।

अब बताइए मुझे… जो आपको खिलाता हो थाली.. क्या उसकी जेब होनी चाहिए खाली ? किसानों का कर्ज क्यों नहीं माफ होना चाहिए ?

……अनुराग सिंह

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