सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

क्या बौद्धिक इदारों में असहज कर देने वाले विचारों और विषयों पर बातचीत नहीं की जा सकेगी

Sudhanshu Bajpai-


गुरमेहर पर हो रही चर्चा से कातर हो हमारे तमाम सामाजिक न्याय के योद्धा इसे मात्र यहीं तक देख पा रहे हैं कि वो बहुजन की बेटी नहीं है इसलिए उसको धमकी मिलने पर मीडिया चर्चा कर रहा, मुझे तो कुछ और लगता है, क्योंकि इससे भी गंदे ढंग से कविता कृष्णन को रेप की धमकी दी जाती रही और ऐसा ही कुछ अभी प्रतिष्ठित लेखिका नीलिमा चौहान के साथ हुआ,मगर इतना मीडिया के लिए विषय नहीं रहा।
लेकिन इस बार गुरमेहर के बहाने वह तमाम वाजिब सवालों को हजम कर भाजपा-एबीवीपी को एक्सपोज होने से बचा रहा है। पूरी बहस राष्ट्रवाद पर ले जाके पटक देना चाहता है जबकि दिल्ली के रामजस कालेज में हुयी घटना से सवाल यह खङा हुआ कि क्या अब छात्र संगठन तय करेंगे कि किसी कॉलेज-विश्वविद्यालय में किस विषय पर सेमिनार होगा और किसे वक्ता के तौर पर बुलाया जाएगा? सवाल खड़ा हुआ कि क्या बौद्धिक इदारों में असहज कर देने वाले विचारों और विषयों पर बातचीत नहीं की जा सकेगी? प्रोफेसर्स,छात्राओं और महिला पत्रकारों के साथ मारपीट कौन सी देशभक्ति है? सवाल है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी वाली सरकार बनने के बाद क्यों विभिन्न विश्वविद्यालयों में जिस तरह हिंसक घटनाओं और विवादों में बढ़ोतरी हो रही है? सवाल है कि क्यों देश के प्रतिष्ठित जेएनयू, डीयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्लाय, जादवपुर विश्वविद्यालयों में हुए विवादों के एक केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के करीबी छात्र संगठन की भूमिका रही है?