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देशी पद्धति से प्रतिरोधकता बढ़ाकर सन्त समीर जी अब तक सौ से ज्यादा कोरोना पीड़ितों का कर चुके हैं इलाज़

सन्त समीर जी कोरोना काल में अपने अनूठे या ये कहें कि दिव्य ज्ञान से अनेक असाध्य व्याधियों से लोग को मुक्त करते आए हैं । ध्यान रहे कि श्री समीर जी देश के जाने-माने लेखक व पत्रकार हैं । इनके पास चिकित्सा करने की कोई वैध उपाधि नहीं है फिर भी लक्षणों के आधार पर रोग को डाइग्नॉस कर वह लाइलाज़ बीमारी भी ठीक कर देते हैं । इस कोरोना की आपदा में श्री समीर जी ने सरकार से उन्हें कोरोना वायरस से पीड़ितों का इलाज़ करने की अनुमति भी मांगी किन्तु मेडिकल प्रेक्टिशनर नहीं होने के कारण उन्हें अनुमति नहीं मिली । सन्त समीर जी के ही शब्दों में आप उनके योगदान को समझिए और पढ़िए अत्यन्त ज्ञानप्रद लेख

महामारी के फैलने की ख़बर फैलनी शुरू हुई तो मुझे जो लगा, मैंने भी इससे बचने के उपायों और इसके सच-झूठ पर लिखना शुरू किया। ऐसी कोई उम्मीद कभी नहीं थी कि इस सरकारी तन्त्र और एलोपैथी को ही परम वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति मान लिए जाने के इस दौर में किसी कोरोना मरीज़ का इलाज करने का कोई मौक़ा मुझे दिया जाएगा। लोगों की जान बचाने और उन्हें डर के माहौल से बाहर निकालने का मामला था, तो मैंने कई बार माँग की, पर सरकार ने यह मौक़ा मुझे नहीं दिया। बात यह भी है कि भले ही मेरे हाथों कई असाध्य बीमारियाँ ठीक हो गई हों, पर मैं मेडिकल प्रेक्टिशनर नहीं हूँ। कानून है कि बग़ैर डिग्री लिए आप डङ्के की चोट पर इस तरह से इलाज करके किसी की जान बचाने का काम नहीं कर सकते। बिना पढ़े-लिखे भी करोड़-डेढ़ रुपये डोनेशन देकर अगर मैंने एमबीबीएस की डिग्री ली होती तो मैं सरकारी तौर पर इलाज करने का अधिकारी होता। भले ही मरीज़ के पेट में कैंची या रूमाल छोड़ देता या पेड़ू में दर्द सुनते ही अपेण्डिक्स का ऑपरेशन कर देता, पर मेरी क़ाबिलियत बनी रहती और कोई माई का लाल मुझे अपने नाम में डॉक्टर लगाने से नहीं रोक सकता। कानून के इन अन्धों को कौन समझाए कि भाई, डिग्री इसीलिए बनाई गई थी कि किसी विषय की सुनियोजित जानकारी देने की संस्थागत व्यवस्था हो, पर ज़रूरी जानकारी और अनुभव अगर कहीं बिना डिग्री के भी दिखाई दे जाय तो वह तो और ज़्यादा सम्मान का पात्र मान लिया जाना चाहिए।

ख़ैर, संयोग ऐसा बनता गया कि भले ही सरकार ने मेरी बात अनसुनी कर दी हो, पर मुझे कोरोना मरीज़ कुछ यों मिलने शुरू हुए कि मिलते ही गए। हर दिन चार-पाँच। अब तक क़रीब सौ का इलाज कर चुका हूँ और केवल तीन या चार, जो पहले से एण्टीबायोटिक वग़ैरह ज़्यादा खा चुके थे, को ठीक करने में हफ़्ते भर लग गए, वरना सभी तीन से पाँच दिन में पूरी तरह ठीक हो गए। इन दिनों मेरी दिनचर्या का काफ़ी हिस्सा कोरोना मरीज़ों को फ़ोन पर दवाएँ बताने में बीत रहा है। एक ठीक होता है तो दूसरे को ख़बर देता है, इस तरह से बीते दो महीनों में जाने कितने ऐसे अनजाने लोगों की आवाज़ें सुनने को मिली हैं, जिन्हें मालूम नहीं ज़िन्दगी में कभी देख भी पाऊँगा नहीं! कोरेण्टाइन में रह रहे कई लोग मेरी बताई दवाएँ नर्सों के ज़रिये जुगाड़ लगाकर सगे-सम्बन्धियों से मँगवा कर ले रहे हैं और मज़े में तीन-चार दिन में ठीक हो रहे हैं। कुछ जगहों की कहानियाँ प्रमाणों के साथ बयान कर दूँ तो हङ्गामा मचने का अन्देशा है, इसलिए महामारी के शान्त होने पर कुछ रहस्योद्घाटन करना ज़्यादा उचित रहेगा।

ठीक हो चुके कुछ लोगों ने जोश-जोश में कुछ ऐसा प्रचार कर दिया है कि सन्त समीर ने जैसे कोरोना की कोई नई दवा तलाश ली है, जबकि यह सच नहीं है। मैंने सिर्फ़ इसे साधारण फ्लू (जो कुछ स्थितियों में ख़तरनाक हो सकता है, पर अन्य तमाम बीमारियों के साथ भी ऐसा ही है) मानकर लक्षणों के हिसाब से दवाएँ दी हैं और ये सभी दवाएँ या जड़ी-बूटियाँ ज़माने से इस्तेमाल में आती रही हैं। कुछ भी नया नहीं है। यह बात ज़रूर है कि मेरे बताए कई घरेलू नुस्ख़े और होम्योपैथी दवाइयों को देश में कई जगहों पर लोगों ने अपने-अपने नाम से प्रचारित किया है। जिन लोगों ने फेसबुक पर 31 जनवरी और 4 फरवरी की मेरी पोस्टें पढ़ी होंगी, वे यह सब आसानी से समझ सकते हैं। वैसे यह ग़लत भी नहीं है, क्योंकि कोई भी होम्योपैथ लक्षणों के हिसाब से सोचेगा तो वह भी इन्हीं दवाओं के पास से गुज़रेगा।

इतने मरीज़ों को देखने-समझने के बाद एक बार फिर कहूँगा कि यह बीमारी बहुत आसान है, पर इसे डर का माहौल बना-बनाकर ख़तरनाक बनाया जा रहा है। इस रिसर्च के बारे में शायद ज़्यादा बताने की ज़रूरत नहीं होगी कि कैसे डर से पैदा हुआ तनाव मौत का ख़तरा कई गुना बढ़ा देता है। सच्चाई यह है कि चार-छह दिन आप ख़बरों से निगाह हटा लीजिए, आपके इर्दगिर्द कहीं कोई महामारी नहीं दिखाई देगी। जितनी ज़्यादा जाँच, उतने ज़्यादा सङ्क्रमित। हमारे देश में साधारण फ्लू से हर साल क़रीब एक करोड़ लोग सङ्क्रमित होते हैं। अगर कोरोना स्टाइल में लोगों को पकड़-पकड़ जाँच की जाने लगे तो साधारण फ्लू के सङ्क्रमित दस-बारह करोड़ मिलेंगे। पूरे देश की कोरोना जाँच हो जाय तो इसमें भी सङ्क्रमितों की औसत सङ्ख्या इसी के आसपास मिलेगी। बाक़ी खेल और व्यापार डर का है। महामारी के प्रश्न पर मैं लम्बा लेख पहले ही लिख चुका हूँ। यह ‘महामारी पर खुला ख़त’ शीर्षक से यूट्यूब पर तो मौजूद है ही, कुछ दिनों बाद इसका कुछ हिस्सा आप एक प्रतिष्ठित साइंस मैगज़ीन में भी पढ़ सकेंगे।

केवल जनहित का ख़याल करके एक बात आज वेण्टिलेटर पर पहुँच रहे लोगों के लिए कह रहा हूँ। आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि वेण्टिलेटर पर जाने के बाद बचकर वापस आने की सम्भावना न के बराबर होती है, पर मेरे तरीक़े से काफ़ी लोग बचाए जा सकते हैं। अभी आप वेण्टिलेटर वाले सौ में से बमुश्किल चार-छह को बचा पाते हैं, पर मेरे जैसे तमाम होम्योपैथ पचास-साठ को आराम से बचा ही लेंगे। बचने वालों की सङ्ख्या पचास-साठ से ज़्यादा भी हो सकती है, पर एक औसत मानकर चल रहा हूँ कि कम-से-कम इतनों के लक्षण ठीक-ठाक ढङ्ग से हम समझ ही जाएँगे। मैं जानता हूँ कि फेसबुक की मेरी मित्र-सूची में कई बड़े-बड़े नेता और अधिकारी मौजूद हैं। ऐसे लोगों से निवेदन है कि मेरी अपील सही जगह पर पहुँचा पाएँ तो मैं आमजन के लिए सेवा का यह काम करने को तैयार हूँ। जिन लोगों की ज़िन्दगी की उम्मीदें मृतप्राय हैं, हो न हो, हमारे जैसे लोगों की वजह से ही उनकी उम्मीदें एक बार फिर ज़िन्दा हो जाएँ।

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