सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आज (३० मई) ‘हिन्दीपत्रकारिता-दिवस’ (तिथि) है

मेरे पत्रकारीय जीवन की एक झलक–

मैने अपने दशकों की पत्रकारीय यात्रा मे कभी अपने जीवनमूल्यों के साथ समझौता नहीं किया, जो कि मेरा ‘युगबोध’ भी था। एक हिन्दी-दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक तथा अनियतकालीन (जिसकी (प्रकाशन-)अवधि निर्धारित न हो) समाचारपत्र-पत्रिकाओं मे ‘सह-उपसम्पादक से लेकर प्रधान सम्पादक तक’ की यात्रा के नाना प्रवास (‘पड़ाव’ का तत्सम रूप) खट्टे-मीठे-तीते अनुभवों को समेटते रहे।

‘कहीं न रुकते-कभी न झुकते’ के सिद्धान्त-व्यवहार को समरूप मे जी पाना, आज के युग मे किसी भी के लिए ‘सम्भव’ नहीं है; क्योंकि आज का पत्रकार विशुद्ध रूप से ‘नौकरी’ और ‘व्यवसाय’ कर रहा है। उसे वर्तमान पत्रकारिता-पद्धति ने ऐसा बना दिया है कि वह सुस्पष्ट शब्दों मे कहता रहता है– अब हम ‘नौकरी’ कर रहे है, ‘पत्रकारिता’ नहीं।

मेरे अब तक के जीवन-कालखण्ड मे लगभग ३५ समाचारपत्र-पत्रिकाएँ रहीं, जिनमे मेरी पत्रकारीय आयु अत्यल्प रहा करती थी; कारण सुस्पष्ट हैं, ‘स्वतन्त्र और उन्मुक्त रहकर कर्त्तव्यनिर्वहण करना’, ‘नौकरी नहीं, उद्देश्य, ध्येय तथा लक्ष्य-विशेष की सम्प्राप्ति-हेतु कर्मपथ पर अग्रसर बने रहना’। मुझे किस संस्थान मे कितनी अवधि तक कार्यरत रहना है, इसका निर्धारण मै स्वयं करता था; यह पृथक् विषय है कि मेरी कार्यपद्धति और प्रकृति-प्रवृत्ति बहुत कम लोग को रास आती थी, इसलिए ऐसी परिस्थिति भी उत्पन्न कर दी जाती थी, जिससे कि तंग आकर मैं उस प्रतिष्ठान से स्वयं को सुदूर कर लूँ। मैं समझौतावादी नहीं रहा हूँ और न ही किसी प्रतिष्ठान के स्वामी का क्रीतदास (क्रय किया हुआ पराधीन सेवक/ग़ुलाम), जो गिड़गिड़ाता; पदप्रहार कर (लात मारकर) आगे बढ़ जाता था। मै प्रत्येक प्रतिष्ठान के वातावरण को देख-समझ कर निर्धारण कर लेता था कि वहाँ कितनी अवधि तक स्वकर्त्तव्य का निर्वहण करना है; यहाँ तक कि ‘दिनांक और मास’ का भी निर्धारण कर लेता था।

प्राय: देखा गया है कि कहीं भी कर्म करते समय यदि किसी की सेवा पर कोई संकट आता है अथवा उसकी सम्भावना प्रबल होने लगती है तब वैसे लोग अपने उस सेवाकाल मे ही किसी और नौकरी की तलाश मे जुट जाते हैं। मेरी मति-गति (बुद्धि/मस्तिष्क/मन की गति) निराली रही है। मैं जैसे ही किसी प्रतिष्ठान के साथ सम्बन्ध-विच्छेद करता था तब ‘मतभेद’ ही नहीं, ‘मनभेद’ के स्तर पर भी वहाँ से स्वयं को सदैव के लिए हटा लेता था और पुन: आमन्त्रण मिलने पर भी उधर दृष्टि नहीं करता था। मै एक प्रतिष्ठान से तन-मन के साथ जैसे ही अलग होता था वैसे ही किसी अन्य प्रतिष्ठान करबद्ध मुद्रा मे खड़ा दिखता था।

मेरे पास प्रतिष्ठानो की ओर से मौखिक अथवा लिखित प्रस्ताव प्रेषित किये जाते थे; कुछ प्रतिष्ठान-स्वामी अपने क्रीतदास-विशेष को मिष्टान्न-विशेष पूरित (पूर्ण) डिब्बे के साथ मेरे निवासस्थान पर इस आशय के साथ भेजा करते थे कि उनके मृतप्राय प्रतिष्ठान को पुनरुज्जीवित (‘पुनर्जीवित’ अशुद्ध है) कर सकूँ। मेरी वर्जना (मना करना) सुनने के बाद मेरी पत्नी से कहते थे, “भाभी जी! एक बार भाई साहब को कह दीजिए कि वे हमारे यहाँ आकर एक बार देख लें। होटल बुक कर दिया जायेगा; सारी सुविधाएँ रहेंगी।”

मैने जितने भी समाचारपत्रिकाओं मे जिस भी प्रकार के दायित्व-निर्वहण किये थे, उन्हें अपना प्रतिष्ठान समझकर और भूख-प्यास को प्राथमिकता न देकर।

अनेक पत्रकारिता-प्रशिक्षण-संस्थानो और समाचार-प्रसंग आलेख (फ़ीचर)-अभिषदों (सिण्डिकेट्स) के शीर्षस्थ पद (निदेशक) पर रहकर नाना प्रयोग करते हुए, अपनी पत्रकारीय क्षमता का विस्तार किया और परमार्थ-हित मे यथाशक्य (सामर्थ्य के अनुसार) अपना अंशदान कर, समाज के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता रहा।

पत्रकारिता के विद्यार्थियों को मेरे बृहद पत्रकारीय अनुभवों का व्यावहारिक लाभ प्राप्त होता रहे, इस प्रयोजनसिद्धि-हेतु सात पुस्तक लोकार्पित हुए, जिनका अध्ययन-अध्यापन आज भी गतिमान् है।

मेरी सारस्वत यात्रा का विस्तार ‘एक महाग्रन्थ’ की कामना करता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० मई, २०२२ ईसवी।)