सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

जी हाँ, मै ‘प्यार’ बेचता हूँ।

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आइए! मेरी ‘वर्ल्ड-फ़ेमस’ दुकान मे तशरीफ़ लाइए।
जनाब! मै प्यार बेचता हूँ।
अनोखा प्यार और निराला प्यार :―
किसिम-किसिम का प्यार;
तरह-तरह का प्यार;
भाँति-भाँति का प्यार;
नाना प्रकार का प्यार;
विविध प्रकार का प्यार;
पृथक् प्रकार का प्यार;
अलग प्रकार का प्यार;
अलाहदा प्रकार का प्यार;
भिन्न प्रकार का प्यार;
जुदा-जुदा का प्यार।
स्वदेशी प्यार-विदेशी प्यार;
आप प्यार, आम प्यार, ख़ास प्यार;
मर्दाना प्यार, ज़नाना प्यार, मेहराना प्यार।
प्यार-ही-प्यार :―
बड़ा प्यार, मझोला प्यार, छोटा प्यार;
गारण्टीवाला-वारण्टीवाला प्यार;
थोक-भाववाला प्यार-खुदरा प्यार;
ब्राण्डेड प्यार, मिक्स्ड प्यार, लोकल प्यार।
गोल प्यार, तिकोन प्यार, चौकोर प्यार।
हाथी-प्यार, कमल-प्यार; साइकिल-प्यार;
पंजा-प्यार, हँसुआ-बाली, धनुष-तीर-प्यार, मशाल-प्यार।
मनसे-प्यार और जनसे प्यार;
तनसे प्यार और ठनसे प्यार।
पक्-पक् प्यार, बक्-बक् प्यार, झक्-झक् प्यार और टक्-टक् प्यार।
अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक प्यार;
दलित प्यार, स्खलित प्यार;
हिन्दू-प्यार, मुस्लिम-प्यार;
मन्दिर-प्यार, मस्जिद-प्यार;
जयश्रीराम-प्यार, अल्लाहू अकबर-प्यार;
पण्डित-प्यार, मुल्ला प्यार;
फ़क़ीरी प्यार, चौकीदारी प्यार।
असवर्ण-सवर्ण प्यार; साम्प्रदायिक प्यार;
अनुसूचित जाति-प्यार-अनुसूचित जनजाति प्यार;
बैकवर्ड प्यार, फॉरवर्ड प्यार;
प्यार-ही-प्यार।
न पसन्द आये तो बदल लो प्यार।
हुजूर!
शरमाना कैसा?
जब विधायक-सांसद जनता-द्वारा दिये गये प्यार को ठुकुराकर,
दूसरे दलों की झूठी पत्तलें चाट लेते हैं
तब आपको प्यार का स्वाद बदलने मे ख़ौफ़ कैसा?
जनाब!
मै प्यार का तिजारत भी करता हूँ।
थोक माल का विक्रेता जो ठहरा।
पहले फुटकरिया माल बेचता था,
अब एजेंसी खोल रखा हूँ।
फ्रेंचाइज़ी भी देता हूँ।
मेरी एजेंसी का वैश्वीकरण भी हो चुका है।
सार्क से लेकर राष्ट्रमण्डल तक;
किसान-आन्दोलन से गुटनिरपेक्ष आन्दोलन तक;
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संयुक्त राष्ट्रसंघ तक।
विश्व हिन्दू परिषद् से माध्यमिक शिक्षा परिषद् तक।
मण्डल से कमण्डल तक; उत्तरप्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से संघ लोक सेवा आयोग;
राज्य लोक सेवा आयोग से उच्चतर शिक्षा आयोग तक।
ई० डी से सी० डी० तक;
सी० बी० आइ० से बी० सी० सी० आइ० तक।
बेनामवर से लेकर नामवर तक;
मेरी एजेंसी की फ्रेंचाइचीज़ लेकर लोगबाग़
प्रगतिशील प्यार का परचम लहराते हुए, अटकते, भटकते, लटकते, सटकते,
जनवाद की रेवड़ी बाँटते आ रहे हैं
और उसका स्वाद कचरते हुए,
पंचसितारा बीयर-बार में लाला लाभदेव के प्राणायाम की मुद्रा में,
आमलेट और बिरियानी सटकाते हुए,
नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, गुण्डा-विमर्श तथा हिजड़ा-विमर्श की
पटकथा लिख रहे हैं।
मेरे भाई, बहनो, मितरो!
ज़रा सोचिए तो?
कभी इतने तरह के प्यार सम्भव हैं क्या?
यह तो एक प्रकार की जुम्लेबाज़ी है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जनवरी, २०२३ ईसवी।)