क्या यही है मज़हबी शिक्षा ?

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’
प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24

जमीन की सतह पर किसी शहर, गांव, सेहरा का कोई घर या कोई खेमा ऐसा बाकी नहीं रहेगा, जहाँ अल्लाह तआला इस्लाम के कलिमा को दाखिल न फ़रमा दें । मानने वाले को कलिमा वाला बनाकर इज़्ज़त देंगे और न मानने वाले को ज़लील फ़रमाएंगे । फिर वो मुसलमानों ने मातहत बनकर रहेंगे । (मुस्नद अहमद)

हदीस की इस आयत में इस्लाम का बदरंग चेहरा साफ़ तौर पर देख सकते हैं। इस्लाम सारे विचारों को कुचलने पर आमादा है। शरीयत का आसरा लेकर वह अवाम को डराता है और लालच देता है, क्यों? क्या इस्लाम के पूर्व कोई धर्म नहीं था? जब कोई व्यक्ति, समाज या देश अपनी संस्कृतियों और मान्यताओं से खुश है तो किसी को उनकी खुशियों में आग लगाने का क्या अधिकार है? जबर्दस्ती कोई कलिमा क्यों पढ़े? इस्लाम न मानने वाला ज़लील नहीं ज़हीन है। इस्लाम वही क़ुबूल नहीं करता जिसमें प्रज्ञा है और साहस है। जिसे अपने ईश्वर पर भरोसा है। इस्लाम से वही नहीं डरता है जो ईमान वाला है। डर तो बेईमानों को होता है। विषयी लोगों को होता है। जन्नत और जहन्नम के फेर में वही पड़ते हैं जिनके मन में डर समा गया हो। हम किसी ऐसे आदेश को ईश्वरीय नहीं मानते जो सर्वधर्म समभाव के विरुद्ध हो।