आख़िर कब तक?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय :

जुम्हूरियत को नंगी दिखाओगे कब तक?
बेहयाई की सीरत दिखाओगे कब तक?
जाहिल-मवाली अब दिखे हैं हर जानिब,
लुच्चों को सिर पे बिठाओगे कब तक?
तवाइफ़ से बढ़कर सियासत है दिखती,
ये माख़ौल क़ानूनी उड़ाओगे कब तक?
लिये आईन: मुन्तज़िर-मानिन्द१ दिखते,
बेशर्मों की सूरत दिखाओगे कब तक?
कारनामों की तवारीख़ काली बहुत है,
सफ़ेदी की परतें चढ़ाओगे कब तक?
साहिब! चलो मंज़िल अपनी है बुलाये,
रवादारी२ इन पे दिखाओगे कब तक?
★ शब्दार्थ– १ प्रतीक्षक-भाँति २सहृदयता।
सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ नवम्बर, २०१९ ईसवी)