डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वाह री, बुद्धिमान् और बुद्धिमती जीव!
कोई मुझे ‘काँग्रेसी’ समझता है; कोई ‘साम्यवादी’ तो कोई ‘बी०जे०पी०-विरोधी’।
ऐसे अतिरिक्त बुद्धिवादी कूपमण्डूक हैं; क्योंकि अपनी बुद्धि का विस्तार नहीं करना चाहते। यही कारण है कि वे विवेकशून्यता की स्थिति में ‘पैर-से-पैर’ लड़ाये पड़े रहते हैं; पानी में लाठी भाँजते रहते हैं।
कुछ तो दल-विशेष के ऐसे अन्धभक्त लक्षित होते हैं कि उनकी शिक्षा-दीक्षा और राष्ट्रवादिता पर ग्रहण लगता दिखता है; कुछ इतने हीन होते हैं कि लगता है कि वे (देशी भाषा में ‘लौण्डे-लपाड़ी) ‘अधम’ मानसिकतावाले हैं। ऐसे कई को हमेशा के लिए ‘बाहर का रास्ता’ दिखा चुका हूँ और अभी कई प्रतीक्षासूची में हैं।
अन्य बुद्धिजीवीवर्ग से अपेक्षा है कि मेरे किसी भी सम्प्रेषण पर ‘प्रासंगिक’ टिप्पणी करें; व्यक्तिगत आक्षेप कदापि नहीं।
मेरे विचार नितान्त मौलिक होते हैं। मैं एक उन्मुक्त विचारक हूँ, इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के साथ मेरी वही दूरी है, जो ‘धरा’ और ‘गगन’ का है। मैं यथार्थ-चित्रण का पक्षधर हूँ। संकुचित पथ पर दृष्टि-अनुलेपन करनेवाले समय-सत्य दृष्टिबोध से परे रहते हैं और संकीर्णता को बाहुपाश में आबद्ध कर अपनी घातक और राष्ट्रविरोधी मनोवृत्ति का परिचय देते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १७ मई, २०१८ ई०)