— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मन-मस्तिष्क प्रश्नों का
पिटारा बनता जा रहा है।
अन्तहीन गह्वर में
रह गये हैं तो प्रश्नों के छिलके।
मूल को मुझसे दूर कर
समझौतावादी दुनिया की प्रयोगशाला में
पंचवर्षीय बिस्तर पर लेटाकर
अनगढ़ पत्थरों की भाँति
अपरिपक्व हाथों में छेनी-हथौड़ी थमा
प्रश्नों के बदन
बेख़ुदी में तराशे जा रहे हैं।

छेनी से प्रश्नों के अंग-प्रत्यंगों का
इस भाँति रूपान्तर किया जा रहा है
ताकि साधक, साधन तथा साध्य कभी
एक साथ न हो सकें
धरती और उसके लोग
दिग्भ्रान्त हो अपनी ऊर्जा खोते रहें
और देश की संसद् चलती रहे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ जून, २०२० ईसवी)