—- ० आत्ममन्थन ०—-
★आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
जयजयकारा कभी श्रद्धा-विश्वास के साथ होता था, अब तो वैसी आस्था किंवदन्ती बन चुकी है। यदि कोई बताता और सुनाता है तो ‘दन्तकथा’ से अधिक कोई आकार-प्रकार नहीं ले पाता है। जयजयकारा तो पेशा बन गया है और इसके करनेवाले पेशेवर। ‘आपसी ज़रूरत’ और ‘आपसी समझ’ की अतिरिक्त ‘समझदानी’ इतनी विकसित हो चुकी है कि आप हमारी जय-जयकार करें और हम आपकी– यह सूत्र विस्तारवादी हो चुका है। आप कूड़ा-कचरा से ‘मनदर्पण’ (फेसबुक) को भर दीजिए और हम कहेंगे :– वाह! क्या स्वर्ण-रत्न है। हममे साहित्य और भाषा की कोई समझ नहीं है; परन्तु आप कहेंगे :– वाह सर! आप तो क़लम-तोड़ लेखक/लेखिका हैं। दूसरी ओर, हमारे-आपके ‘अपलेखन’ से साहित्य और भाषा को कितनी क्षति पहुँचती है, उससे किसी का कहीं कोई प्रयोजन नहीं रहता। यही कारण है कि वर्तमान साहित्य रुग्णावस्था में है, जिसके सूँघते ही कोरोना भी ‘लमबरलेट’ हो चुका है। अपना कोबिडवा बिना लूँगी उतारे ही फरहर हो चुका है। उस साहित्य की ऐसी आरती उतारी जा रही है कि सरसत्ती देबी भी पनाह माँग रही हैं, फिर भी उनके प्रति किसी मे न कोई अनुकम्पाभाव है और न ही किसी प्रकार की दया-दृष्टि।
क्या बात है– रहस्यवाद’, ‘छायावाद’, ‘हालावाद’ ‘प्रगतिवाद’ इत्यादिक वाद जीवन्त हो चुके हैं! महादेवी का नव अवतार हो चुका है ; मीर तक़ी मीर और ग़ालिब भी क़ब्र से अँगड़ाई लेते हुए दिखने लगे हैं। अज्ञेय, मुक्तिबोध, धूमिल आदिक खुरपी लेकर जाँघभर पानी में हेलकर नयी कविता- अकवितावादी खेत की निराई-गुड़ाई कर, सम्भावनाओं को ठीक उसी तरह से टटोल रहे रहे हैं, जिस तरह से हमारे स्वनामधन्य नेता-नेतृगण गाय-गोबर-भगवा, मन्दिर-मस्जिद का पारस्परिक संघर्षण कराकर, किसी क्रान्तिकारी प्रतिक्रिया की लपटों के उठने की प्रतीक्षा करते हैं। जो लोग कभी अपने गाँव-मुहल्ले का इतिहास नहीं पढ़ सके, आज रामचन्द्र शुक्ल का अवतार लेकर ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिख रहे हैं। प्रगतिवादी-जनवादी फ़िल्मी अन्दाज़ में नागार्जुन को गाते हुए, हलों में जुते बैलों को पैना से खोदियाते हुए, किसानों के काव्यिक मसीहा बनने का पूर्वाभ्यास कर रहे हैं, “साथी हाथ बढ़ाना” और ख़ुद चिलम चढ़ाकर कोयलावाला इंजिन माफिक धुआँ फेंक रहे हैं। दक्षिणपन्थी अपनी कालिमा छुपाने के लिए श्वेतवस्त्रधारी और भगवाधारी बनकर दीनदयाल उपाध्याय की ‘एकात्म साधना’ पर चौसठपेजिया लिखकर पुरस्कार हथिया रहे हैं; सरकार ‘सरकार’ का फ़र्क़ भी बहुत बड़ा फ़र्क़ दिखा देता है। तिरुवल्लुवर, विवेकानन्द, गोलवलकर आदिक पर लम्बा-चौड़ा हाँकेंगे; किन्तु उनके समग्र चिन्तन की व्यावहारिक खुटकी चबाने से परहेज करेंगे। वामपन्थी मार्क्स, टॉल्सटॉय, लेनिन, गोर्की, स्टालिन आदिक के सिद्धान्तों की चर्चा बड़े-बड़े मंचों पर इस तरह से करते हैं, मानो दोनो विचारकों का समन्वयवादी अवतारी पुरुष झकास बोल रहा हो। वे ज़मानेवालों को दिखाने के लिए चीन-रूस के दर्शनशास्त्रियों और समाजचिन्तकों की बात अपने भाषणों और अपनी कविताओं मे ज़रूर उड़ेलेंगे; परन्तु उनके व्यावहारिक पक्ष को अपनाने की बात आयेगी तब चादर तानकर ओल्हरे हुए दिखेंगे। यही कारण है कि उनका विचारपक्ष भी ३६० अंश के कोण पर साष्टांग दण्डवत् करता दिखता आ रहा है। आदिगुरु शंकराचार्य, मण्डन मिश्र, स्वामी विवेकानन्द, रबिन्द्रनाथ टैगोर आदिक के चिन्तनप्रवाह के वर्णन करने से उनका व्यक्तित्व ‘लघु मानव’-सदृश अनुभव होने लगता है। यही लघुता उनकी ‘प्रभुता’ के नंगे सच को उजागर करने के लिए पर्याप्त है।
वामपन्थी-दक्षिणपन्थी सचमुच मे हमारे साहित्य की सात्त्विकता खा-पी गये हैं; परन्तु पचा नहीं पा रहे हैं। ऐसा इसलिए कि दोनो ने तटस्थ भाव से न कभी सोचा, विचार किया और न ही चिन्तन किया। इतना ही नहीं, अभिव्यक्ति के धरातल पर लोकसत्ता की महत्ता को स्वीकार किया। यही कारण है कि दोनो का लोक स्वनिर्मित से अधिक कुछ नहीं रहा। ऐसी अवस्था मे ‘सह’ और ‘सम’ की अनुभूति-सृष्टि भला कैसे सम्भव हो? वाल्मीकि यदि ‘महाकवि’ कहलाये तो अपने दृष्टि-विस्तार के कारण; पर-कातरता को ‘आत्म पीड़ा’ का विषय बनाने के कारण।
अब तो अनुभव, अनुभावक तथा अनुभूति की अवधारणा ही दीवार घड़ी की सुइयों की तरह से टिकटिकाते हुए बदल दी गयी है। यही कारण है कि ऐसे तत्त्व अनुभव करने के लिए ही ‘अनुभव’ करते हैं। उनका अनुभव-जगत् डकार मारता दिखता है। वे लोग ‘पंचसितारा होटल’ मे टाँगें फैलाकर-सटाकर ‘हाय-हैलो’ का सिगरेटी धुएँ का गुब्बार बनाते हुए, ‘आमलेट’ सटकाते हुए, प्रेमचन्द की कृतियों के पात्र :– होरी, गोबर, धनिया, निर्मला, भीखू आदिक सर्वहारा-वर्ग के प्रतिनिधित्व करनेवाले असहाय-अशक्त पात्रों पर विमर्श करते हैं; दरबार मे राजशाही अन्दाज़ मे सिगार सुलगाकर फूँक मारते हुए, ‘रागदरबारी’ की चिन्ता को ‘अपनी चिन्ता’ बताते हुए, ‘समीक्षा-सम्राट्’ की पदवी धारण कर लेते हैं। बग़ल मे एक अनोखी मुद्रा मे बैठी-लेटी-पलटी-सलटी ‘लिव इन रीलेशन’ परम्परा की वैधानिक श्यामल-सलोनी ‘गर्लफ्रेण्ड’ के होठों के मुसकान को अपनी आँखों पर साटते हुए, ‘नारी-विमर्श’ पर संवाद कर एक-दूसरे के साथ वैचारिक होड़ करते हुए, स्वयं को ‘श्रेष्ठ विचारक’ (‘सर्वश्रेष्ठ’ अशुद्ध है।) सिद्ध करने के लिए हाथापाई की अजीबोग़रीब परम्परा का दर्शन भी कराते हैं।
अब साहित्य पर पद-प्रहार करते हुए, ‘राहित्य’ (‘साहित्य’ का विपरीत शब्द) का महिमा-मण्डन किया जा चुका है। पद्य और गद्यविधाओं की नयी-नयी अवधारणाएँ विवाह-मण्डप मे हैं; सामूहिक गठबन्धन की तैयारी कर ली गयी है। बिना सेनूर चिपकाये कोहबर मे भारत-पाकिस्तान के बीच ‘टी-२०’ के फ़ाइनल की तरह से सारी तैयारी की जा चुकी है। क्या-क्या गुल खिलायेंगी, जब घड़ी की दोनो सुइयाँ ‘बारह’ पर चिपक जायेंगी तब यह भी ‘फेअर ऐण्ड लवली’ की तरह से चीकन-चाकन होकर दिखने लगेगी। ‘लिव्-इन-रीलेशन’ मे ‘कोहबर की शर्त’ नदारद है; पहिलहीं सब भोग लगा चुके रहते हैं। इससे बढ़कर संसार मे ‘नारी-विमर्श’ का विषय हो सकता है क्या :– न तुम हारे, न हम जीते? नारी-विमर्श को परवान चढ़ानेवाले कर्त्ता-धर्त्ता नंगी आँखों से एक-दूसरे से सवाल करते हैं और जवाब भी ले लेते हैं।
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सम्पर्क– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘सारस्वत सदन’
२३५/११०/२-बी, अलोपीबाग़
प्रयागराज– २११ ००६
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