जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-

जीवन हो इतना दीप्ति प्रखर,
चढ़ जाओ तुम उन्मुक्त शिखर।
मन में न हो कोई आवेश कभी,
बन जाओ हृदय के मुख्य प्रहर।।
सरल हृदय के हो तुम स्वामी,
मेरे मन मन्दिर के तुम अन्तर्यामी।
कान्ति तुम्हारी नित करे प्रकाशित,
मन तो होता बादल सम कामी ।।
मुख से प्रवाहित हो प्रिय वाणी,
जीवन हो खुशियों से परिधानी।
देखो अम्बर है ऐसे रहा निहार,
जैसे धरती ओढ़े चुनर है धानी।।