
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
”अच्छे दिन आयेंगे-अच्छे आयेंगे”—- इहे सुनाई-सुनाई के, देखाइ-देखाइ के उ तहरा के भरमवले रहे आ तब तहरा के हमार बतिया न नू बुझात रहे; तब त कनवाँ में ठेपी लगाइ के ‘नमो-नमो’ के माला जपत रहलू। अरे दादा! तब त तू अइसन हिलकोरा मारत रहलू कि त तहरा ओ भकती-भाव के आगे समुदरो के जवार-भाटा हारि जातु रहे। अब तहार गैस सिलीण्डर आ टामाटर, पियाज आ सब तरकरियन के दाम बढ़ल लागत बा, घर-गिरहत्थी के हिसाब-किताब डोले लागल त अब ‘नमो-नमो’ के जगहिया पर “टुअरा आ निसन्तनिया काहें नइखे मर-बिलाइ जात”, “हे टूटाबीर बाबा! हे बरहम बाबा! ओकरा के जलदियि ए दुनिया से उठा ल, त हम तहरा के सई मन के कराह के तिलवा चढ़ाईब” कहि-कहि के सरापत बाड़ू। तू हमरा के चैन जिये देबू कि ना जिये दूबू। ऊ परधान मन्तरी हउवन। जब चहिंहें त त तहरा घरि में ढूका लगवाइके तहरा के अइसन जेल में ठूसवा दिहें कि राग मलहार गावत रहि जइबू। अब सेकराहे-सेकराहे रुदराछ के माला जप। हमार कहनिया मनले रहतू त तहार इ हाल ना होखित।
आच्छा सुन! जवन भईल तवन भईल, हई हमरा पोंछिटवा से सई-सई किलो के लोरवन के पोंछि ल। आ कानि खोलि के सुन ल, अब भुलाइयो के कमल-समल के चकर में मति पड़िह आ ना ओकरा पीछे-पीछे— ‘गुड गवनेंस’ के झण्डवा हिलाइह। हम कहत रहनी की ओटवा देबे मति जा; बाकिर तू त हाई जम्प करे लगऊ आ जाइ के निसान लगा अइलू | अब काहें पिपरा त; झँख |