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आचार्य पाण्डेय ने जिस रीति से हम सभी को एक अनुपम सीख दी है, वह ऐतिहासिक है : पिलप्पा पिण्ड्या

देश के प्रत्येक अध्यापक के लिए शुद्ध हिन्दी का ज्ञान आवश्यक-- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ

‘अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विकास परिषद्’, डिण्डिगुल, तमिलनाडु की आन्तर्जालिक व्याख्यानमाला सम्पन्न

“आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के ज्ञान का प्रभाव अनन्त काल तक रहेगा”– प्रो० पिलप्पा पिण्ड्या

“माना कि आज विश्व में हिन्दी का बृहद् स्तर पर प्रचलन है; परन्तु वह किस प्रकार है, इसे समझना होगा। चूँकि आज मैं देश के समस्त अध्यापक-वर्ग को ‘हिन्दी : संविधि और प्रयोग’ विषय पर सम्बोधित कर रहा हूँ, इसलिए हिन्दी-भाषा, व्याकरण तथा उसके वैज्ञानिक औचित्य पर मित्रवत् सविस्तार वार्त्ता करना चाहूँगा। एक अध्यापक, विशेषत: हिन्दी-माध्यम में अध्यापन करनेवाला, यदि यह समझ लेता है कि हिन्दी तो उसके लिए हस्तामलक है तो वह उसकी बहुत बड़ी भूल है। उसका विद्यार्थी यदि मौखिक और लिखित भाषाओं के स्तर पर अशुद्ध लेखन करता है तो उस सम्बद्ध अध्यापक की अक्षमता का परिचायक है, जो अपने विद्यार्थी को वैसी शिक्षा से जोड़ नहीं पाता।”

उक्त विचार भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के हैं, जिन्होंने कल (२३ सितम्बर) तमिलनाडु के डिंडिगुल जनपद में ‘अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विकास परिषद्’ की ओर से ‘हिन्दी-पखवाड़े’ के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में
देशभर के सहस्रों अध्यापकों के लिए आयोजित एकदिवसीय आन्तर्जालिक व्याख्यानमाला के अन्तर्गत व्यक्त किये थे। आचार्य पं० पृथ्वीनाथ ने अपने व्याख्यान के अन्तर्गत ध्वनि, वर्ण, शब्द, अर्थ, अभिप्राय, आशय, वाक्य, मात्रा, वर्तनी, विरामचिह्न, सन्धि, समास, प्रत्यय, उपसर्ग-परसर्ग आदिक समस्त व्याकरणिक और भाषावैज्ञानिक विन्दुओं पर प्रशिक्षण करने की शैली में सोदाहरण प्रकाश डाले थे।”

अध्यक्षता कर रहे पिलप्पा पिण्ड्या ने कहा, “आचार्य पाण्डेय ने जिस रीति से हम सभी को एक अनुपम सीख दी है, वह ऐतिहासिक है। कौन कहता है कि आज हमारे मध्य व्याकरणाचार्य पाणिनि और महागुरु पतंजलि नहीं हैं। प्रयागराज अध्यात्म की नगरी रही है और वहाँ से जो प्रसादरस के कतिपय छींटे आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के द्वारा हम सभी अज्ञानियों पर पड़े हैं, उसका प्रभाव अनन्त काल का विषय बन चुका है।

प्रो० राधारत्नम् ने समस्त उपस्थितजन के प्रति आभार-ज्ञापन करते हुए कहा, ”आज का दिन हम सभी आचार्यगण के लिए एक ‘विद्यार्थी’ के रूप में रहा। हम निश्शब्द हैं।”