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परीक्षा नियामक प्राधिकारी, उत्तरप्रदेश के हिन्दी-प्रश्नपत्र में लज्जाजनक अशुद्धियाँ!..?

● भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने चिन्ता जतायी

परीक्षा नियामक प्राधिकारी, उत्तरप्रदेश की ओर से 6 अक्तूबर को करायी गयी द्वितीय सेमेस्टर– 2020 के हिन्दी-विषय की परीक्षा; प्रश्न-पुस्तिका ‘।।-6’ में ऐसी-ऐसी अशुद्धियाँ देखने को मिली हैं, जिन्हें कक्षा आठ का विद्यार्थी बता सकता है। परीक्षा का नाम ‘DELED’ बताया गया है, जबकि सर्वप्रथम इसकी हिन्दी लिखी जानी चाहिएथी, ताकि विद्यार्थी इसकी सही हिन्दी जान सकें। इतना ही नहीं, अधिकतर विद्यार्थी और अध्यापक इसका नाम ‘डीएलडी’ बताते हैं, जो कि अँगरेज़ी की दृष्टि से भी अशुद्ध प्रयोग है। घोर आश्चर्य तब हुआ जब छठे प्रश्नपत्र को ‘षष्ठम् प्रश्न–पत्र’ लिखा गया था। यदि यही हमारे विद्यार्थी अपनी उत्तरपुस्तिका/उत्तरपर्णी में लिखते तो उन्हें शून्य (०) अंक दिया जाता। ‘छठा’, ‘छठे’ के लिए शुद्ध शब्द ‘षष्ठ’ है; ‘षष्ठम्’ कोई सार्थक शब्द है ही नहीं। प्रश्न-पुस्तिका उसे कहते हैं, जब कम-से-कम आठ-दस पृष्ठ हों, अन्यथा ‘प्रश्नपत्र’ कहा जायेगा। घटते क्रम में ‘प्रश्न–पुस्तिका’, ‘सेमेस्टर–2020’ तथा ‘प्रश्न–पत्र’ में प्रयुक्त (–) इस चिह्न को ध्यानपूर्वक देखें। इनमें कोई अन्तर नहीं है। प्रत्येक विरामचिह्न अर्थ-विशेष के लिए प्रयुक्त किया जाता है, उसका भिन्नार्थक नहीं होता। ऐसे में यह चिह्न पूर्णत: अशुद्ध है। अब इस प्रश्नपत्र में ‘निर्देश–‘ के स्थान पर ‘निर्देश:’ का प्रयोग किया गया है, जिसका कोई अर्थ नहीं है। ‘निर्देश:’ 1. में क्रिया ‘दिये गए हैं’ में ‘दिये गये’ होगा; क्योंकि जब ‘दिया से दिये’ होगा तब और ‘गया से गये’ भी होगा। इसी के निर्देश 2- में उत्तर पुस्तिका के स्थान पर ‘उत्तर-पुस्तिका’ होगा। इसी वाक्यान्तर्गत ’75’ को शब्द में ‘पच्चहत्तर’ लिखा गया है, जबकि उपयुक्त शब्द ‘पचहत्तर’ है। कुल मिलाकर, यह वाक्य-विन्यास ‘बचकाना’ है। इस प्रश्नपत्र का पहला प्रश्न और उसके विकल्प व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हैं। पहला प्रश्न है :– ‘काव्य को कितने भागों में बाँटा गया है–‘ जब ‘कितने’ का प्रयोग है तब इस प्रश्न के अन्त में प्रश्नात्मक चिह्न (?) लगेगा। इसके विकल्प में ‘दृश्य’ को ‘काव्य’ से अलग (दृश्य काव्य) और ‘श्रव्य’ को ‘काव्य’ से मिला दिया गया है, जबकि दोनों को ‘अलग-अलग’ लिखना चाहिए था। ऐसा इसलिए कि दृश्य और श्रव्य का अर्थ क्रमश: ‘देखने-योग्य’ और ‘सुनने-योग्य’ है। इसी प्रश्न के तीसरे विकल्प में (1) और (2) होगा, न कि ‘1, 2 दोनों’। जब दो दिख रहे हैं तब अलग से ‘दोनों’ लिखने का औचित्य? फिर (1) और (2) है तब 1, 2 कैसे? इसी का चौथा विकल्प एक वाक्य है तो अन्त में पूर्ण विराम क्यों नहीं लगाया गया? इस तरह की अशुद्धियाँ कई प्रश्नों में दिख रही हैं। दूसरा प्रश्न है :– ‘पठन का अर्थ है–‘ यहाँ इस प्रश्न के अन्त में निर्देशक-चिह्न (–) के स्थान पर विवरण-चिह्न (:–) का प्रयोग होगा। ऐसे अशुद्ध प्रश्न पाँच में से चार हैं। चौथे प्रश्न में ‘शब्दाँश’ का प्रयोग किया गया है, जबकि ‘शब्द+अंश’ से ‘शब्दांश’ बनेगा। इसी प्रश्न में ‘बदल देता है’ के ‘है’ में अल्प विरामचिह्न (,) लगेगा। ग्यारहवें प्रश्न ‘काल की कितनी’ अवस्थायें मानी जाती हैं’ में दो प्रकार की अशुद्धियाँ हैं :– पहली, काल में ही अवस्था निहित है और दूसरी, अवस्थायें के स्थान पर अवस्थाएँ’ होगा। यहाँ पर ‘काल के कितने प्रकार हैं?’ होगा। बारहवें प्रश्न में ‘उदाहरण के सहित’ के अर्थ में ‘उदाहरण-सहित’/’सोदाहरण’ होगा। सोलहवें प्रश्न में ‘विराम चिन्ह’ के स्थान पर ‘विरामचिह्न’ होगा। अट्ठारहवें प्रश्न का वाक्य ही अशुद्ध है। ‘लिखित अभिव्यक्ति के मुख्य कौन-कौन से साधन हैं?’ के स्थान पर ‘लिखित अभिव्यक्ति के कौन-कौन-से मुख्य साधन हैं?’ होगा।

अब प्रश्न है, सम्बन्धित परीक्षा-नियामक अशुद्धियों का पर्वत खड़ा करके हमारे विद्यार्थियों के सम्मुख कौन-सा आदर्श उपस्थित कर रहा है? इस पर सम्बन्धित शीर्ष विभाग और मन्त्रालय को कठोर क़दम उठाना चाहिए।