जिसको हमने मान लिया है कि ये हमारा मालिक है, ये हमें जीवन दे रहा है, ये रोजी-रोटी दे रहा है; और उसकी आज्ञा हम न माने, उससे उल्टे खड़े हो जाएँ, तो फिर आदर का रिश्ता कहाँ रहा? आप एक बात का ख्याल अवश्य रखना कि अगर आपके मन में कभी गुनाह करने का भाव आ जाए और आप उसके हुक्म को न मान रहे हों, तो यह बात बिलकुल भी ठीक नहीं। सृजनकर्ता की, पालनहार की, प्यारे परमात्मा की अवहेलना कत्तई उचित नहीं।
प्रभु का हुक्म है- नेक कर्म करो। जब यह बात जानते और मानते हो तो आप उसके राज्य से कभी भी बाहर मत जाना। उसकी इच्छा को नकारकर आप में कुछ काम करने की इच्छा कभी जगे तो आप कोई ऐसी जगह ढूँढना, जहाँ वह न हो और हो सके तो उससे छिपाकर वह काम करना। तब आप ख़ुद सवाल कर बैठोगे कि यह कैसे सम्भव है? जो सभी के दिलों की बात जानता है, जो सभी के दिलों में रहता है, जो हर व्यक्ति के मन और हृदय की हर बात को जान लेता है तो फिर उससे छिपाकर कोई कार्य कैसे किया जा सकता है? तब आप ख़ुद सोचने लगेंगे कि मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ। देखो! जब तुम उसके राज्य से बाहर जा ही नहीं सकते तो फिर यह बात भी सोच लेना कि उसके कानून की पकड़ से भी बाहर नहीं जा सकते! यदि उसके प्रतिकूल कोई काम किया तो तुम्हें उसकी सजा भोगनी ही पड़ेगी।
आप एक काम और करना- मौत का फरिश्ता जब तुम्हारे सामने आये तो उससे कहना- ज़रा ठहर! पहले मैं प्रायश्चित कर लूँ, तौबा कर लूँ। वह तुमसे कहेगा कि ऐसा तो बिलकुल सम्भव नहीं। देखो! फरिश्ता हमारे कहने से तो चलेगा नहीं। इसलिए मैं आपसे कहता हूँ कि मौत का फरिश्ता आने से पहले प्रायश्चित कर लो और अपनी ज़िन्दगी को सुधार लो, न जाने कब मौत आ जाये और आपका सामना उससे हो जाये। आप पूछोगे कि ऐसा करने से क्या फ़ायदा होगा? मैं आपसे कहता हूँ कि आप मालिक का प्यार पाओगे और उसके अपने हो जाओगे। यह भी हो सकता है कि मालिक का दास बनते-बनते आप उसके इतने करीब हो जाओ कि आपमें और मालिक में कोई अन्तर ही नजर न आये।