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स्वतंत्र मुक्तक : हर एक मन में इक नई जंग

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

अब तो चरागों को तेल नहीं मिलते

अब तो मिट्टी के वो ढ़ेर नहीं मिलते।
बचपन कॉन्वेंट के बस्तों से बदल गया,
अब तो ख़ुशी के दो बोल नहीं मिलते।।
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फ़रेब ने तो हर दिल को तंग कर दिया,
हर एक मन में इक नई जंग कर दिया।
बड़े शौक़ीन हुआ करते थे हमारे बुजुर्ग,
अब ज़माने ने महफ़िल बेरंग कर दिया।।
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आखिर जहाँ तपिश नहीं रही रिश्तों में ,
वहाँ अब मोहब्बत भी नहीं रही पुश्तों में।
बदलते दौर का असर है या मन का फ़ितूर,
अब ख़ुदा का रूप भी न रही फरिश्तों में।।
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