फूटा यौवन फाड़ प्रकृति की पीली चोली, आयी रे होली

“काली- काली कोयल बोली, होली, होली, होली ।

फूटा यौवन फाड़ प्रकृति की पीली, पीली, चोली।”

होली रंगों, उल्लास और खुशियों का त्योहार है। यह नई फसल के स्वागत का त्यौहार है। होली सर्दियों के अंत और गर्मियों की शुरुआत का त्यौहार है। होली बुराई पर अच्छाई , असत्य पर सत्य, नास्तिकता पर आस्तिकता , पाप पर पुण्य तथा दानवता पर देवत्व की विजय का मांगलिक त्यौहार है।

होली फागुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है लेकिन इसकी तैयारी और धूमधाम फागुन माह के साथ ही शुरू हो जाती थी। हमारे गांव में फागुन की शुरुआत से ही फाग शुरू हो जाता था। शाम होते ही बच्चे, बड़े , बूढ़े शीतला माता के चबूतरा के पास इकट्ठा होते। लोग मां का आशीर्वाद लेते फिर ढोल, नगाड़े के साथ सस्वर –

“होली खेले रघुबीरा अवध में, होली खेले रघुबीरा”
जैसे होली गीत से शुरुआत होती और फिर गांव के तमाम लोगों के दरवाजे-दरवाजे जाकर फाग सुनाया जाता। जिसके घर के सामने टोली पहुंचती, वह स्वेच्छा से ठंडाई, भांग, बताशा, गुड़ आदि का वितरण टोली को करता।

गुलाल लगाकर लोग एक दूसरे का अभिवादन करते। समान वय के लोग गले मिलते, छोटे उम्र के लोग बड़ों का पैर छूकर आशीर्वाद लेते। प्रतिदिन देर शाम तक यह जश्न चलता रहता। पूरे फागुन के महीने यही मौज-मस्ती चलती रहती।

फागुन की पूर्णिमा के दिन लोग गांव में एक नियत स्थान पर उपलो,लकड़ियों का ढेर इकट्ठा करते । फिर शुभ घड़ी में इस ढेर यानि होलिका में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। इसी अग्नि में लोग नए अनाज की बाली भूनकर अपने आराध्य को अर्पित करते और प्रसाद स्वरूप घरवालों को बांटते।

होली से अगला दिन अर्थात चैत्र की प्रतिपदा को लोग रंग खेलते । होली के रंग में रंगकर धनी-निर्धन, काले-गोरे, ऊंच-नीच, बालक-वृद्ध के बीच की सीमा टूट जाती थी। लोग पुरानी से पुरानी शत्रुता भी होली के दिन भुला देते थे।

लेकिन आज होली का वास्तविक अर्थ गुम सा होता नजर आ रहा है। समय के साथ बदलती भौतिकवादी सोच, पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव, शहरीकरण, एकल परिवार एवं परिस्थितियों के थपेड़ों ने इस सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक त्यौहार की अद्भुत मस्ती को काफी हद तक प्रभावित किया है।

पहले लोग होली की बधाई घर- घर जाकर देते थे, अब व्हाट्सप्प एवं फेसबुक पर संदेश भेजकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है । टेसू से बने प्राकृतिक रंगों के स्थान पर अब निम्न गुणवत्ता वाले हानिकारक रासायनिक रंगों का उपयोग किया जा रहा है। पहले लोग नगाड़े की धुन पर झूमते थे, अब डीजे की कानफाड़ू धुन पर अर्थहीन गानों पर नागिन डांस होता है। तब ढोलक एवं मृदंग के साथ फगुआ (होली के गीत) गाने की परंपरा थी, अब ‘ बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी’ जैसे अश्लील गीतों का दौर है।

पहले लोग होली के दिन भांग-ठंडाई का सेवन करते थे, अब नशेबाजी एवं शराब का दौर है। तब होली पवित्र प्रेम, अपनत्व एवं भाईचारे का प्रतीक थी, अब – ‘बुरा न मानो होली है’ के नाम पर हुड़दंगी एवं अश्लीलता की जा रही हैं। तब घर में निर्मित गुझिया, नमकपारा, मठरी एवं मिठाइयों से होली मिलने आए लोगों का स्वागत होता था, अब बाजारी सामग्रियों से स्वागत किया जा रहा है।

आज हम होली त्यौहार का उद्देश्य, इसकी गरिमामयी मौज मस्ती, इसमें निहित प्रेम सचमुच बिसरा चुके हैं।जब गोबर, कंडा (उपला) भी ऑनलाइन बिकने लगे तो समझिए कि हम सचमुच मॉडर्न हो गए हैं। अब तो मुझे वह दिन भी दूर नहीं लगता जब रंग लगाने के लिए लोग कूरियर सेवा का सहारा लेंगे।

(आशा विनय सिंह बैस)