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‘शब्दशिल्प-संस्कार’ की उपयोगिता-महत्ता को समझें

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हमारा सांस्कृतिक-सामाजिक वैभव कैसे लुप्त हुआ?

★आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

हमने जब अँगरेज़ी तिथि, माह तथा वर्ष अङ्गीकार कर लिये हैं अथवा उनका व्यवहार करने के लिए व्यवस्था बना दी गयी है तब उन्हें ‘आङ्गल’ कहकर, उनका तिरस्कार करना बुद्धिमत्ता नहीं। जीवन-मरण की गणना भी उन्हीं के आधार पर की जाती है; उनके बिना हमारी गतिविधियाँ सुव्यवस्थित नहीं हो पातीं; संचालित नहीं हो पातीं तथा हम एक डग भी बढ़ नहीं पाते। ऐसी व्यवस्था बना दी गयी है। यदि भारतीय समाज अपनी मूल तिथि, मास, संवत् के प्रति वस्तुत: आस्थावान् रहता तो आज हमारा सांस्कारिक परिदृश्य कुछ और ही रहता। हमारे देश का वैभव वर्णनातीत रहा है। यहाँ देश की मिट्टी से जुड़कर भी उसमें ‘वैदेशिक गन्ध’ ढूँढ़ने और अनुभव करनेवालों का भाव-ही-भाव है। यही कारण है कि अब तक हमारी अपनी सर्वमान्य ‘एक भाषा’ तक नहीं दिख रही है।

प्रभुता-सम्पन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य भारत अपना मौलिक संविधान न लिख सका, इससे अधिक विडम्बना और क्या हो सकती है! कहने और उल्लेख करने के लिए इस देश में एक-से-बढ़कर-एक विधिवेत्ता रहे हैं; परन्तु उन्होंने इस विषय को गम्भीर माना ही नहीं; अपने संज्ञान-पटल पर लाने का विचार तक नहीं किया; तात्कालिक लाभ पर उनकी दृष्टि स्थिर रही तथा ‘क्रीतदास’ (ख़रीदे गये ग़ुलाम)-सदृश अपने आचरण की सभ्यता से अपने स्वामिभक्तिमयी-दासत्व का परिचय देते रहे।

स्वाधीनता के बाद से अब तक जितने भी शासक इस देश में शासन करते आये हैं, वे सभी नितान्त गर्हित, संकीर्ण-क्षुद्र स्वार्थपोषक-स्वमानकीकरण लोकतान्त्रिक मूल्यों को जनसामान्य पर थोपते आये हैं; क्योंकि ‘सोने की चिड़िया’ से अभिहित-प्रतिष्ठित भारत की मर्यादा के साथ वे सभी अधिनायकत्व का कुत्सित परिचय प्रस्तुत करते हुए, उसकी मान-मर्यादा धूलि-धूसरित करते आ रहे हैं और यहाँ का जनसामान्य नतमस्तक है; मन्त्रमुग्ध है तथा सम्मोहित है। यही कारण है कि वही किंकर्त्तव्यविमूढ़ जनता अभारतीय मान्यता को ग्रहण करने के लिए बाध्य और विवश है और उसकी प्रतिकारात्मक ऊर्जा को दीन-हीन-क्षीण ग्रन्थियों को अनावृत करने की दिशा में धकेल दिया गया है।

इससे इतर, भारत की मूल मिट्टी से सम्पृक्त यदि वासी है तो उसकी दृष्टि किसी देन की ग्रहणशीलता के प्रति कृतज्ञ संलक्षित होती रहती है। अब तक देश में भारतदेश का जो भी व्यक्ति ‘एक से इकतीस’ तिथि ‘जनवरी से दिसम्बर’ माह तथा ‘एक से अन्तिम वर्ष’ तक की स्वयंसिद्ध महत्ता की अवहेलना, उपेक्षा तथा तिरस्कार कर, अपना अतिरिक्त पाण्डित्य और कर्मकाण्ड का प्रदर्शन करता है, वह ‘नितान्त कृतघ्न’ है।

भारतवर्ष में कितने लोग हैं, जो ‘पूर्णिमा से ‘अमावस्या’ तक, दो पक्षों में विभाजित तीस तिथियों का व्यवहार अपने दैनन्दिन के जीवन की गतिविधियों में करते हैं; ‘चैत्र से फाल्गुन’ मास, वर्ष प्रतिपदा’ से अपनी समस्त गतिविधियाँ समारम्भ और सम्पन्न करते तथा ‘संवत्’ का व्यवहार करते हैं?

वाह! उपयोग और उपभोग करते समय ऐसे जनसमूह का ‘पाण्डित्यपूर्ण’ तर्क विलुप्त हो जाता है। ज्ञातव्य है कि भारत में उपयोग और उपभोग की जितनी भी वस्तुएँ हैं, अधिकतर अभारतीय हैं; उनका आविष्कार विदेशियों ने किये थे, तो क्या भारतीय लोग उनकी देन की उक्त ढंग से उपेक्षा करेंगे?

देश में जितने भी अति महत्त्व के पगसंचलन-मार्ग हैं, उनका या तो मुग़ल बादशाहों ने निर्माण कराये थे अथवा अँगरेज़ अधिकारियों ने। भारतीय तो ‘महा बेईमान’ निर्माणकर्त्ता के रूप में विश्व-विश्रुत हो चुके हैं। वे आज कोई भी निर्माणकार्य कराते हैं तो उसमें इतने छिद्र दिखते हैं कि उनके भीतर आँखें स्थिर कर उनके चरित्र के नाना कुसंस्करणों की पटकथा लिखी जा सकती है, जिस पर प्रत्येक राष्ट्रभक्त के आक्रोशमय और विक्षोभपूर्ण अभिव्यक्ति सार्वजनिक होती दिख सकती है। कई मार्ग अभारतीय शासकों के नाम से भी जानी जाती हैं। ऐसे में, हम यह नहीं कहते, हम मुसलमान शासक शेर शाह सूरी के ‘ग्रैण्ड ट्रैंक रोड’ पर चल रहे हैं। हमने यदि उन सभी वस्तुओं का सेवन कर लिया है तो हमें उनके साथ ‘विभेदीकरण’ करने की मानसिकता का परित्याग करना होगा।

वैसे अधिकतर भारतीय कृतघ्न होते देखे गये हैं। वे वस्तुओं का उपयोग-उपभोग यथासामर्थ्य करते हैं; परन्तु अपनी भावना-संवेदना के साथ तादात्म्य स्थापित नहीं करते; हमेशा अभेद को ‘भेद’ की गोद में बिठाकर चलते बनते हैं, जो कि ‘भर्त्सना’ के योग्य है।
आँखें खोलिए!

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ जनवरी, २०२० ईसवी।)

‘सर्जनपीठ’ के निदेशक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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