एन० डी० ए० को पस्त करता दिख रहा आई० एन० डी० आई० ए०

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(भाषाविज्ञानी एवं मीडियाध्ययन-विशेषज्ञ, प्रयागराज।)

पृष्ठभूमि को समझें

जैसे-जैसे लोकसभा-चुनाव की अवधि समीप आती जा रही है, चुनाव-परिदृश्य अत्यन्त रोचक और कुतूहलवर्द्धक होता जा रहा है। कोरोना की अवधि मे लाखों की संख्या मे उद्योग-धन्धे बन्द हो गये थे और करोड़ों भारतीय बेरोज़गार हो गये थे, यह किसी से छिपा नहीं है। करोड़ों की संख्या मे जिस तरह से भारतीय कोरोना-रोग से ग्रस्त रहकर ‘रामभरोसे’ जीवन-यापन कर रहे थे और चिकित्सालयों मे आशाजनक-विश्वासजनक उपचार-सुविधाएँ नहीं थीं तथा जनता मे यह विचार व्याप्त हो गया था कि चिकित्सालय मे भरती (‘भर्ती’ अशुद्ध है।) होने का मतलब था, ‘मौत के मुँह मे आना’, इसीलिए बहुसंख्य लोग अपने घर मे रहकर उपचार कराते रहे। प्रवासी भारतीयों के संकट-संत्रास देखकर ख़ून के आँसू निकल पड़ते थे। उनकी कण्टकाकीर्ण मार्गों पर अपने परिवार के साथ, अकेले, गर्भवती महिला और दूधमुँहे बच्चों के साथ गठरी, घर-गृहस्थी को सिर और कन्धे, साइकिलों पर लिये दशा आज भी जीवन्त हो रही है तथा सरकार की निर्ममता भी। उन्हें देश की जनता भूली नहीं है। किसान-आन्दोलन के विरुद्ध दमनात्मक रुख़ और विश्वासघात की पटकथा जिस निर्ममता के साथ मोदी-सरकार ने लिखी थी, वह भी आँखों के सामने चलचित्र की तरह से घूम रहा है।

राहुल गान्धी की ‘भारत जोड़ो यात्रा और अवैध सज़ा : चुनाव मे दम फूँकती हुईं!

राहुल गान्धी के 'भारत जोड़ो' अभियान के बाद से 'भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस' को जिस तरह से और जिस तरह की ऊर्जा मिली है, उसके कारण आगामी चुनाव बेहद दिलचस्प हो चुका है। देशभर मे राहुल गान्धी की उक्त यात्रा का समर्थन किया जाना, इस दिशा मे एक संकेत है कि भारतीय जनता पार्टी के सामने अब भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस तन कर खड़ी हो चुकी है। आपको स्मरण होना चाहिए कि महाराष्ट्र के नान्देड़ मे एक चुनावी सभा मे तत्कालीन भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेसाध्यक्ष राहुल गान्धी ने कहा था, "मुझे एक बात बतायें― नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेन्द्र मोदी― सभी के नाम मे 'मोदी' कैसे है?" उनके इस वक्तव्य को लेकर अवैध तरीक़े इतनी शीघ्रता के साथ काररवाई और कार्यवाही की गयी थी कि राहुल गान्धी को अपराधी ठहराते हुए उनकी संसद-सदस्यता, उनका आवास तथा सम्बद्ध समस्त साधन-सुविधाओं से वंचित रखा गया था। उस एकपक्षीय काररवाई के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी के भीतर से भी आवाज़ उठने लगी। आगे चलकर, वही काररवाई सत्तापक्ष के लिए "गले की हड्डी' बन गयी थी। अन्तत:, उच्चतम न्यायालय की ओर से उन्हें दोषमुक्त किया गया था।  कर्नाटक विधानसभा मे नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, जे० पी० नड्डा आदिक को जिस तरह से मुँह की खानी पड़ी थी, उसका भी प्रभाव लोकसभा-चुनाव मे दिखनेवाला है।
 
महिला पहलवानो के यौन-शोषण और उत्पीड़न को लेकर भारतीय जनता पार्टी के कथित बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह के विरुद्ध बहुसंख्यक जनता का एकसाथ होना, इस बात को प्रमाणित करता है कि एन० डी० ए० के नेता जितना सोच रहे हैं उतना उनके लिए आसान नहीं दिख रहा है। उन महिला पहलवानो के साथ इतना घट जाने के बाद यदि काग़ज़ पर दिखनेवाला देश का प्रधानमन्त्री बिलकुल चुप्पी साध ले तो यह बात गले उतरनेवाली नहीं दिखती। इतना  भारतीय जनता पार्टी जबसे २८ राजनीतिक दलों के महागठबन्धन 'इण्डिया' का गठन किया गया है, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की रातों की नीँद हराम हो चुकी है। यही कारण है कि अपनी कुण्ठा मिटाने के लिए सत्ताधारी लोग इण्डिया को 'घमण्डिया' कहते आ रहे हैं, जबकि देश की जनता अच्छी तरह से जान चुकी है कि अस्ल मे, 'घमण्डिया' कौन है। 

विचार और व्यवहार मे दोगलापन

विचार और व्यवहार मे दोगलापन कैसे जन्म लेता है, इसे समझने के लिए नरेन्द्र मोदी, अमित शाह आदिक के श्रीमुख से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को ‘परिवारवादी’ कहे गये को समझें। वे ही लोग उस पुरुष ‘श्री राम’ के नाम पर “जय श्री राम” का आतंकी और भयावह बोल बोलते हैं; परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि उनका वह श्री राम भी परिवारवादी थे। उनकी वंशावली ‘ब्रह्मा’ से आरम्भ होकर मरीचि, कश्यप, विकुक्षि, कुक्षि, इक्ष्वाकु मनु, विवस्वान, बाण, अनरण्य, पृथु, त्रिशंकु, धुन्धुमार आदिक से होते हुए, नाभाग, अज, दशरथ, राम तक पहुँचती है। भारतीय जनता पार्टी के इस सफ़ेद दोगलापन को देश की जनता जान और पहचान चुकी है। उस दल के ऐसे घिनौने लोग जिस ‘परिवारवादी राम’ की आड़ मे देश की जनता, विशेषत: मानसिक और बौद्धिक स्तर पर चक्षुविहीन ‘हिन्दूत्व’ के पोषकों को आँखों मे धूलि झोंकते आ रहे हैं, उससे मुक्ति पाने का समय अब आ चुका है। नरेन्द्र मोदी से पूछा जाना चाहिए, उनके रक्षामन्त्री राजनाथ सिंह का बेटा पंकज सिंह, हिमाचलप्रदेश के पूर्व-मुख्यमन्त्री प्रेम धूमल का बेटा सूचनाप्रसारणमन्त्री अनुराग ठाकुर और भाई अरुण धूमल आइ० पी० एल० का चेअरमैन, गृहमन्त्री अमित शाह का बेटा जय शाह बी० सी० सी० आइ० का सचिव, हाल ही मे समाजवादी पार्टी से अलग होकर बाप-बेटा ओ० पी० राजभर और अरुण राजभर का एन० डी० ए० मे शामिल होना किस परिवारवाद की पहचान हैं? इनके अतिरिक्त भारतीय जनता पार्टी और एन० डी० ए० मे एक-से-बढ़कर-एक परिवारवादी भरे हुए हैं। यहाँ देखते समय आँखें फूट जा रही हैं। देश की जनता इस सच से भी वाक़िफ़ हो चुकी है।

जनता सत्ता-बदलाव के पक्ष मे

इस समय जिस तरह से देश मे शासननीति संचालित की जा रही है, उसे देख-समझकर जनता ने सत्ता-बदलाव का मन बना लिया है। सत्तापक्ष अभी तक अपना पाप छिपाता आ रहा है और विपक्षी दल के नेताओं को नीचा दिखाने का हर पल कुचक्र रचता आ रहा है।

चुनावी विश्लेषण और सीटों का पूर्वानुमान

हमने पिछले कुछ दिनो से देश के सभी राज्यों की स्थिति का विधिवत् अध्ययन किया है। आज देश मे शासन-स्तर पर जिस तरह की अराजकता का वातावरण बना दिया गया है; देश की जनता को डरा-धमका कर रखा गया है; सारे नियम-क़ानून सरकार के पक्ष मे बनाये जा रहे हैं; न्यायालय से सीधे पंगा लिया जा रहा है; नरेन्द्र मोदी-सरकार की जिस तरह से निरंकुशता दिख रही है, इन सबके परिणाम और प्रभाव से देश की जनता घुटन महसूस कर रही है। यही कारण है कि वह अबकी बार मोदी-सरकार और उसकी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदख़ल करने का पूरी तरह से मन बना चुकी है। यदि 'ई० ह्वी० एम०' का दुरुपयोग नहीं किया गया तो मोदी-सरकार की विदाई और भारतीय जनता पार्टी का ऐतिहासिक पराभव निश्चित है।
 
अब हम एक-एक राज्य की चुनावी स्थिति को समझते हुए, अपने पूर्वानुमान को प्रस्तुत करते हैं; यानी किस राज्य मे किसे कितनी सीटें मिल सकती हैं। यह एक पूर्वानुमान है, न कि किसी प्रकार की घोषणा और न ही दावा है। हमने जो अध्ययन किया है और जो चुनावी आँकड़े प्रस्तुत किये हैं, उनमे अधिकतम १० से २० सीटों का अन्तर आ सकता है।
   
हम अपना चुनावी विश्लेषण  दक्षिणभारत से करते हैं।  दक्षिण-भारत से एन० डी० ए० लगभग साफ़ है :– तमिलनाडु मे ३९ मे ३९ सीटें इण्डिया को, तेलंगाना मे १७ सीटों मे से १० से १५ इण्डिया को और ० से २ अन्य को, आन्ध्रप्रदेश मे २५ मे से इण्डिया को २० से २२, एन० डी० ए० को ० से २ तथा अन्य को ० से २ सीटें मिल सकती हैं।  

कर्नाटक की पिछली विधानसभा मे वहाँ के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को जिस तरह से धो दिया था, उससे साफ़ हो जाता है कि वहाँ की जनता ने लोकसभा-चुनाव मे भी उसे बाहर का रास्ता दिखाने का मन बना लिया है, फिर कर्नाटक के उपमुख्यमन्त्री और कुशल रणनीतिकार डी० के० शिवकुमार ने जो तैयारी की है, उससे एन० डी० ए० का ठहर पाना बहुत मुश्किल है। यही कारण है कि वहाँ की २८ सीटों मे से इण्डिया को २५, एन० डी० ए० को ० से २ तथा अन्य को ० से २ सीटें मिल सकती हैं। पूर्वोत्तर-भारत मे भी इण्डिया बढ़त पर है :– असम मे १४ सीटों मे से इण्डिया को ५ से १०, एन० डी० ए० को ३ से ५ तथा ० से १ अन्य को मिल सकती हैं।

सभी राजनीतिक दलों की निगाहें उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिमबंगाल महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश के मतदाओं पर टिकी हुई हैं। उत्तरप्रदेश मे खुले रूप से हत्या, बलात्कार, अपहरण एवं तरह-तरह के अपराध, धार्मिक दंगे, शिक्षा-परीक्षा-नियोजन मे घोर विसंगति, शिक्षित बेरोज़गारों का असंतोष और आक्रोश, अवैध रूप से एकपक्षीय बुल्डोजर-नीति, अपने दल के अपराधी नेताओं का संरक्षण, ठाकुरवाद, साँड़ों/साँढ़ों का आतंक, किसानो का अभावग्रस्त जीवन, बिजली-पानी का अभाव, गड्ढे से भरी सड़कें, पश्चिमी उत्तरप्रदेश मे जलसंकट, मूलभूत समस्याएँ आदिक, हिन्दू-मुसलिम, मन्दिर-मस्जिद दलित आदिक के प्रति जो घृणित राजनीति दिखी है, उससे राज्य की बहुसंख्य जनता स्वयं को संकट मे पाती आ रही है, जिसका आगामी चुनाव-परिणाम पर प्रभाव पड़ना सुनिश्चित है। यही कारण है कि हमारे सर्वांगीण अध्ययन के पश्चात् जो समीकरण सामने आये हैं, उनमे उत्तरप्रदेश की कुल ८० सीटों मे से ४५ से ५० सीटें एन० डी० ए० के पक्ष मे आती हुई दिख रही हैं, जबकि इण्डिया इस बार पूरी ताक़त के साथ चुनावी तैयारी कर चुका है, जिसके पक्ष मे २५ से ३० सीटें आ सकती हैं; जहाँ तक अन्य निर्दलीयसहित शेष दलों की स्थिति है, वे ० से २ सीटें पा सकते हैं। पश्चिमबंगाल बहुत ही महत्त्वपूर्ण राज्य है, जहाँ कुल ४२ सीटें हैं। वहाँ इस बार एन० डी० ए० का मुक़ाबला ममता बनर्जी की तृणमूल काँग्रेस से ही नहीं होगा, बल्कि इण्डिया मे शामिल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के गठबन्धन के साथ होगा। वहाँ ४२ सीटों मे से इण्डिया को ३५ से ४०, एन० डी० ए० को ० से २ तथा अन्य को ० से २ सीटें मिल सकती हैं। महाराष्ट्र के चुनावी परिदृश्य पर इस समय राजनीतिक ‘राहु-केतु’ मँडरा रहे हैं। जिस तरह से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने संवैधानिक संस्थाओं का भरपूर दुरुपयोग करते हुए, विपक्षी दलों के अस्तित्व को मिटाने का घिनौना खेल किया है; उनके संवैधानिक तरीक़े से चुने गये विधायकों को ई० डी०, सी० बी० आइ० तथा आयकर-विभाग का भय दिखाकर उन्हें अपने पक्ष मे किया है, उसे महाराष्ट्र की जनता ने समझ लिया है। तथाकथित चाणक्य शरद पवार किस करवट बैठेंगे, यह अबूझ पहेली महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी के लिए चिन्ता का विषय बनी हुई है। ‘इण्डिया’ उस स्थिति का भी सामना करने के लिए तैयार है। यदि महा विकास अघाड़ी मे सब कुछ संतुलित रहा तो आगामी चुनाव मे इण्डिया को ४८ सीटों मे से २५ से ३० और एन० डी० ए० को १५ से २० तथा अन्य को ० से २ सीटें मिलने की सम्भावना दिख रही है। बिहार का राजनीतिक माहौल बहुत बदल चुका है; नीतीशकुमार और लालूप्रसाद यादव का गठजोड़ इस समय बेहतर स्थिति मे है। पिछड़ी जातियों की जनसंख्यागणना का मुख्य स्वर बिहार से उठा था, हमे इसे भूलना नहीं चाहिए तथा मोदी-सरकार की उस जनगणना की उपेक्षा किये जाने के बाद भी बिहार मे जाति-सर्वेक्षण का कराया जाना नीतीश-सरकार के पक्ष मे जाता है। बिहार की कुल ४० सीटों मे से ३० से ३५ इण्डिया, ५ से ७ एन० डी० ए० को तथा ० से १ सीट अन्य के पक्ष मे आ सकती हैं। आदिवासी-प्रधान झारखण्ड-राज्य की कुल १४ सीटों मे से ८ से १० सीटें इण्डिया और ३ से ५ सीटें एन० डी० ए० के पक्ष मे आती दिख रही हैं।

राजस्थान मे कुल २५ सीटें हैं, जहाँ की अधिकतर सीटों पर मुख्यमन्त्री अशोक गहलौत की पकड़ बनी हुई है। काफ़ी समय से प्रभुत्व को लेकर अशोक गहलौत और सचिन पायलट मे जो संघर्ष चल रहा था, उसे फ़िलहाल, शान्त करा लिया गया है; अब दोनो के समर्थक एक बार फिर से भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की सरकार का पुनर्गठन कराने के लिए प्राणपण (‘प्राणप्रण’ अशुद्ध शब्द है।) से लग गये हैं। दूसरी ओर, अशोक गहलौत ने नैतिक स्तर पर भारतीय जनता पार्टी की पूर्व-राजस्थान-मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे को साध लिया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी की ओर से वसुन्धरा की पूर्ण उपेक्षा की गयी है। यही कारण है कि राजस्थान की २५ सीटों मे से इण्डिया को १५ से २० और एन० डी० ए० को ४ से ७ सीटें मिल सकती हैं। मध्यप्रदेश प्रथम दृष्टया शिवराज सिंह चौहान उर्फ़ मामा की कुर्सी उखड़ चुकी है। वहाँ घोटाले-पर-घोटाले किये जाते रहे और मामा चुप्पी साधे रहे। शिवराज सिंह चौहान के अधिकतर विधायक-पूर्व-विधायक तथा कार्यकर्त्ता भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की ओर से घोषित मध्यप्रदेश के भावी मुख्यमन्त्री और पूर्व-मुख्यमन्त्री लोकप्रिय नेता कमलनाथ के साथ आ खड़े हुए हुए हैं। ज्योतिरादित्य सिन्धिया, जो कभी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सजग सिपाही होते थे, असंतुष्ट होकर भारतीय जनता पार्टी के खेमे मे चले गये थे, बदले मे वहाँ उन्हें अभी तक अपमान के सिवा कुछ नहीं मिला। ऐसा हो सकता है, वे अपना प्रभाव-प्रदर्शन करने के लिए ‘पीछे के रास्ते’ से कमलनाथ से हाथ मिला लें वा फिर भितरघात करते हुए, मध्यप्रदेश मे मामा की नीवँ को आन्दोलित करने का प्रयास करें। मध्यप्रदेश के आदिवासियों के साथ जब उन्हीं के दल के एक विधायक के प्रतिनिधि ने सीधी के एक विक्षिप्त आदिवासी व्यक्ति के चेहरे पर पेशाब किया था तब उसकी सार्वत्रिक भर्त्सना की गयी थी। अब उसकी अनुगूँज अगले चुनाव मे सुनायी पड़ेगी, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। पटवारी भरती-परीक्षा मे की गयी रिश्वतख़ोरी से वहाँ का युवावर्ग आक्रोशित है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश की २९ सीटों मे से इण्डिया को २० से २५ तथा एन० डी० ए० को ५ से ९ सीटें मिल सकती हैं। छत्तीसगढ़ मे इस समय भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के नेता और वहाँ के मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल के पाँव ‘अंगद-पाँव’ की तरह से दिख रहे हैं। भूपेश ने ‘धान का कटोरा’ के नाम से विश्वप्रसिद्ध अपने राज्य छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए चरणबद्ध ढंग से जितने भी कल्याणकारी कार्य किये हैं उतने देश के किसी भी राज्य मे नहीं किये गये हैं। सबसे बड़ी बात यह रही है कि वे कभी विवादास्पद नहीं रहे। ११ सीटों मे से ६ से १० इण्डिया और ० से ३ सीटें एन० डी० ए० को मिल सकती हैं। गुजरात मे २६ सीटें हैं। इसे भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख राज्य माना जाता है। यहाँ एन० डी० ए० बढ़त पर है। उसे १० से १६ सीटें मिल सकती हैं, जबकि इण्डिया ८ से १० सीटें पा सकता है। ओडिशा मे कुल २१ सीटे हैं, जिनमे से अन्य के हिस्से मे सर्वाधिक ८ से ११, जबकि इण्डिया को ५ से ८ और एन० डी० ए० को ० से २ सीटें मिल सकती हैं।

पंजाब मे भारतीय जनता पार्टी का कोई प्रभाव नहीं है। वहाँ यदि जनमत है तो आम आदमी पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का। अब ये दोनो दल इण्डिया के अंग बन चुके हैं, इस दृष्टि से पंजाब का चुनाव एकपक्षीय रहेगा। वहाँ १३ सीटों मे से इण्डिया के पक्ष मे १२ से १३ और एन० डी० ए० के पक्ष मे ० से १ सीटें आती हुई दिख रही हैं।

अब हम उन राज्यों की चुनावी स्थिति समझते हैं, जहाँ सीटों की संख्या बहुत कम है।

हरियाणा मे डबल इंजन की सरकार वर्षों से विफल दिख रही है। वहाँ के मुख्यमन्त्री मनोहरलाल खट्टर की स्थिति बहुत ख़राब हो चुकी है। नूँह मे जिस तरह से रक्तिम दंगा कराया गया था, उसका प्रभाव विश्वस्तर पर देखा गया था और उस पर तीख़ी प्रतिक्रिया भी हुई थी। हरियाणा से आनेवाली महिला पहलवानो के साथ कुकृत्य करनेवाले बृजभूषण शरण सिंह के विरुद्ध खट्टर चुप्पी साधे रहे, उससे वहाँ की बहुसंख्य जनता आक्रोशित है और उन्हें अगले चुनाव मे मज़ा चखाने का निर्णय कर लिया है। यही कारण है कि हरियाणा की कुल १० सीटों मे से ५ से ७ सीटें इण्डिया और ३ से ५ सीटें एन० डी० ए० को मिलने की सम्भावना है।

दिल्ली मे कुल ७ सात सीटें हैं। वहाँ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ेंगी, जिससे कि भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किलात साफ़ दिखने लगे हैं। वहाँ जिस तरह से एल० जी० (लेफ़्टिनेण्ट जनरल) केजरीवाल को काम नहीं करने दे रहे हैं; महत्त्वपूर्ण कामो मे अड़ंगे लगाते आ रहे हैं; भारतीय जनता पार्टी की ग़लत नीतियों से वहाँ की जनता जिस तरह से दुष्प्रभावित होती आ रही है, उससे लगने लगा है कि सातों सीटों पर इण्डिया क़ाबिज़ हो जाये, फिर भी हम एक सीट एन० डी० ए० के हक़ मे छोड़ते हैं। जम्मू-कश्मीर मे अनुच्छेद ३७० के मुख्य भाग को समाप्त करने से वहाँ की जनता उद्वेलित है। मोदी-सरकार की हिन्दू-मुसलिम और मन्दिर-मस्जिद की गर्हित राजनीति को वहाँ की जनता समझ चुकी है। अब वहाँ के प्रमुख राजनैतिक दल इण्डिया मे शामिल हो चुके हैं, जिससे वहाँ से एन० डी० ए० का पराभव सुनिश्चित है। यही कारण है कि ६ सीटों मे से इण्डिया के पक्ष मे ५ से ६ और एन० डी० ए० के पक्ष मे ० से १ सीट आती हुई दिख रही है।

उत्तराखण्ड मे पाँच सीटें हैं, जिनमे से ३ इण्डिया और २ एन० डी० ए० के साथ आ सकती हैं। हिमाचलप्रदेश की ४ सीटों मे से ३ इण्डिया और १ एन० डी० ए० को मिल सकती हैं।

इस बार देश के पूर्वोत्तर-राज्य के मतदाता इण्डिया के पक्ष मे दिख रहे हैं। इसका कारण भी है। मोदी-सरकार ने इसके अन्तर्गत आनेवाले ८ राज्यों के विकास के प्रति कोई सजगता नहीं दिखायी है। असम मे कुल १४ सीटें हैं। यहाँ पर इण्डिया और एन० डी० ए० मे बराबरी का टक्कर है। इसके साथ ही अन्य दलों की भी भूमिका है। दोनो को ७-७ सीटें मिल सकती हैं; १-२ सीटों की घट-बढ़ भी हो सकती है। मेघालय की दोनो सीटें इण्डिया के पक्ष मे आ सकती हैं। मणिपुर मे हाल मे जिस तरह से बीभत्स घटना घटी थी और मोदी-सरकार मौन बनी रही; नरेन्द्र मोदी विदेश घूमते रहे; देश के अनेक राज्यों मे घूमते रहे; परन्तु मणिपुर मे दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके सामूहिक रूप से घुमाये जाने के प्रसारित वीडियो पर ७७ दिनो तक चुप्पी साधे रहे और समूचा विश्व हतप्रभ रहा। इसी विषय को लेकर संसद् मे कथित मोदी-सरकार के विरुद्ध ‘अविश्वास-प्रस्ताव’ पारित किया गया था, जिसे एक प्रधानमन्त्री के रूप मे नरेन्द्र मोदी ने मज़ाकिया ढंग से दो-चार आदर्शात्मक वाक्य कहकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली थी, जिसे मणिपुर की जनता ने समझ लिया है। यही कारण है कि मणिपुर की दोनो सीटें इण्डिया के पक्ष मे आने की सम्भावना है। मणिपुर की अतीव लज्जास्पद घटना से मिज़ोरम की जनता भी आहत हुई है। मिज़ोरम मे १ सीट है, जिसे इण्डिया जीतता हुआ दिख रहा है। नगालैण्ड और सिक्किम की १-१ सीट है, जो दोनो ही इण्डिया के साथ आती हुई दिख रही हैं। अरुणाचलप्रदेश की २-२ सीटों मे १-१ सीट दोनो को मिल सकती है। त्रिपुरा मे २ सीटें हैं, जिनमे से दोनो सीटें इण्डिया और एन० डी० ए० को बराबर-बराबर मिलती हुई दिख रही हैं। नगालैण्ड मे एक ही सीट है, जिसे इण्डिया के पक्ष मे आने की सम्भावना है। गोवा की २-२ सीटों मे से १-१ सीट दोनो को मिल सकती है।

इस विश्लेषण और सीटों की प्राप्ति के अनुमान से यह साबित हो जाता है कि अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण राजनैतिक दलों के इण्डिया मे सम्मिलित होने से इण्डिया का प्रभाव इस समय सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। इण्डिया मे किसी प्रकार का विघटन न दिखे और मोदी-सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के प्रति संकल्पबद्धता मे कोई कमी नहीं आती है तो विपक्षी दलों का यह यह गठबन्धन अप्रत्याशित सिद्ध हो सकता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ सितम्बर २०२३ ईसवी।)