‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ का अमानवीय चेहरा!

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कोई भी राजनैतिक दल यदि चुनाव लड़े तो अपनी योग्यता के बल पर, न कि ‘मुफ़्तख़ोरों’ के सहारे। आज ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ की ग़लत आर्थिक नीतियों के कारण मुफ़्तख़ोरों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो ‘मध्यम वर्ग’ के लिए ‘सिरदर्द’ बनते जा रहे हैं। इनमे से अधिकतर मुफ़्तख़ोर ‘आवारागर्दी’ करते देखे जा सकते हैं। ग़लत तरीक़े से ‘प्रधानमन्त्री आवास योजना’ का लाभ लेनेवालों की बहुत बड़ी संख्या है, जिसके लिए ग्रामप्रधान, ब्लॉक-प्रमुख आदिक सीधे उत्तरदायी हैं।

‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ इसे बन्द करे; क्योंकि इसका सीधा बोझ मध्यम वर्ग के सिर पर गिर रहा है।
प्रश्न है, नरेन्द्र मोदी की सरकार देश मे काहिलों का एक अलग समाज बनानेवाली मुफ़्तख़ोरी की योजना किसके बल पर लाती है? कथित महिला-पुरुष मुफ़्तख़ोरों से काम क्यों नहीं लेती? उन महिला-पुरुषों को कुटीर-उद्योग के साथ क्यों नहीं जोड़ती?

यदि सरकार और अन्य राजनैतिक दल ऐसा सोचते हैं तो वे समाज को ‘वर्गसंघर्ष’ की ओर ले जा रहे हैं, जो कि एक प्रकार का आपराधिक कृत्य है।

इससे प्रकट होता है कि कथित सरकार और राजनैतिक दलों की जनसामान्य के प्रति कर्त्तव्यपरायणता का क्षरण हो चुका है। सरकार ‘आरक्षण’ की सुविधा भी दे रही है और अलग से दूसरे के हक़ की थाली भी उधर ही सरकाये जा रही है।

पेट्रोल, डीज़ल, रसोईगैस, सी० एन० जी० आदिक मे बेरहमी के साथ वृद्धि कराते हुए, नरेन्द्र मोदी की सरकार अपनी ही ताबूत मे कीलें ठोंकवाने का काम करती आ रही है। महँगाई से प्रभावित जब देशवासी प्रश्न करते हैं– पेट्रोल, डीज़ल, रसोईगैस, सी० एन० जी० आदिक मे अप्रत्याशित वृद्धि क्यों? इस पर भरपूर सुविधा-साधन से युक्त तरह-तरह के मन्त्री जवाब देते हैं– हम फ्री मे राशन भी तो बाँट रहे हैं। इसका मतलब सरकार फ्री मे राशन बाँटने के लिए अधिकतर जनमानस को महँगाई की चक्की मे पिसती जा रही है। यह है, ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ का तर्क।

हमे नहीं भूलना चाहिए कि ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ का जबसे गठन हुआ है तब से ‘उपयोग’ और ‘उपभोग’ की प्रत्येक वस्तु की क़ीमत मे महँगाई का स्तर न्यूनतम २०० % तक बढ़ चुका है। इससे पहले की सरकारों मे ५ पैसे, १० पैसे तथा अधिकतम ५० पैसे की महँगाई बढ़ती थी। इस निर्मम और निकृष्ट क़िस्म की सरकार मे जो वस्तु ५०-७५ रुपये की होती थी, उसे अब ₹२५० तक पहुँचा दिया गया है। ऊपर से रिश्वतख़ोरी और भ्रष्टाचार “दिन दूना रात चौगुनी” को चरितार्थ कर रही है। इस सरकार के जितने भी कृष्ण-पक्षवाले आँकड़े हैं, उन्हें छिपा लिये गये हैं और जो ‘वाहवाही लूटनेवाले शुक्लपक्ष’ हैं, उन्हें गाजे-बाजे के साथ दिखाया जाता रहा है। जी० डी० पी० की स्थिति भयावह स्थिति को पार कर चुकी है। इस सरकार ने ‘वन नेशन-वन टैक्स’ के नाम पर देशवासियों के साथ जो क्रूर छल किया है, उसका परिणाम आज आम जनता, विशेषकर मध्यम वर्ग भुगत रहा है।

पहले बैंकों के खातों मे ₹५०० रुपये तक रखने अनिवार्य थे और कोरोना-काल मे चुपके से ₹२,५०० की राशि कर दी गयी है। बचतखातों के ब्याज, एकमुश्त जमा की गयी धनराशि (एफ० डी०) के ब्याज मे वरिष्ठ नागरिकों को मिलनेवाली सुविधाओं मे निर्ममता के साथ कटौती करायी है। यह सरकार इतनी निर्दय (‘निर्दयी’ अशुद्ध है।) है कि इसके कानो मे जूँ तक नहीं रेंग रहा है। यदि इस तानाशाह सरकार की नीतियों का कोई विरोध कर रहा है तो उसपर ‘राजद्रोह’ का मुक़द्दमा कर दिया जा रहा है; उसका पुलिसतन्त्र अमानवीय व्यवहार करता देखा जा रहा है; अर्थात् रक्षक ही ‘भक्षक’ के रूप मे दुर्व्यवहार करता दिख रहा है।

इस सरकार ने भारतीय समाज को कई हिस्सों मे विभाजित कर दिया है। नरेन्द्र मोदी की सत्ता मे बने रहने की इतनी प्रबल चाह बनी हुई है कि भारत की राष्ट्रीयता बहुत पीछे की ओर धकेल (‘ढकेल’ अशुद्ध है।) दी गयी है। नरेन्द्र मोदी की चाह विकराल रूप लेती आ रही है– लोग मुझे ‘भगवान्’ की तरह पूजें। बेशक, लोग पूजेंगे; पर पहले ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनकर तो दिखाओ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)