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रंज़ो ग़म दूर फेंक ‘पृथ्वी!’ दूर तू निकल

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

ख़ुद को टटोलकर, टटोलता अब उन्हें,
अपनी सदा सुनकर, देता हूँ सदा उन्हें।
किस बात पर मुझसे, वे पराये हो गये?
पैठकर गहराई में, तोलता हूँ अब उन्हें।
एहसास यों ठण्ढा रहा, कुछ सका न मैं,
वक़्त का आलम, कैसे बताऊँ मैं उन्हें?
एहतियात से होठों ने, शिकायत दाब ली,
न सुन सके थे वे, न मैं सुना सका उन्हें।
रंजो ग़म दूर फेंक ‘पृथ्वी!’ दूर तू निकल,
ऐसा क़दम बढ़ा, ज़माना देख ले तुम्हें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २४ अगस्त, २०२० ईसवी।)