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जो बैठे हैं तेरे साथ, वे बेईमान लिये फिरते हैं

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बेजान हुस्न की, अदा लिये वे फिरते हैं,
चश्मे पुरनम की, अदा लिये वे फिरते हैं।
कज़ा लौट घर उनके, दस्तक दे आती है,
साथ ज़िन्दगी का, सामान लिये वे फिरते हैं।
तल्ख़ अन्दाज़ में, शोख़ नज़रें गुफ़्तगू करतीं,
क़ब्र में हैं पाँव, पर अरमान लिये वे फिरते हैं।
जुनूँ का पाँव कब-किधर, मालूम नहीं हमको,
ख़यालात के सहारे, ईमान लिये वे फिरते हैं।
इंसानियत की बात, मत कर तू यहाँ ‘पृथ्वी’,
जो बैठे हैं तेरे साथ, वे बेईमान लिये फिरते हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ अप्रैल, २०२१ ईसवी।)

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