चिलमन उठा, ‘सच’ बयानात हो जाने दो

आँखों-ही-आँखों मे, रात हो जाने दो,
या ख़ुदा! तसल्ली से, बात हो जाने दो।
जिस मकाम पे, छोड़ आया था ज़िन्दगी,
साहिब! इकबार मुलाक़ात हो जाने दो।
भ्रम भी नसीहत दे रहा, उम्रे दराज़ को,
नज़रें हैं हर सू, काइनात हो जाने दो।
तराशा था उसका बदन, तसल्ली से कभी,
चिलमन उठा, ‘सच’ बयानात हो जाने दो।
मुसकुराया हौले से, आँचल गिरा दिया,
तसव्वर-सा कोई, ख़यालात हो जाने दो।
जवाब थे कई, पर सबके होंठ चिपके थे,
बारी है मेरी, सवालात हो जाने दो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ मार्च, २०२४ ईसवी।)