जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद-

गाँव हमारे है बड़ा निराले,
जैसे धरती अमृत के प्याले।
प्रेम जहाँ बसता है पग -२ में,
कभी न पड़ते स्नेह में छाले।।१।।
धरती बिछौना गगन है चादर,
एक -दूजे का हृदय से आदर।
जहाँ की कान्ति कभी न हरती,
चहुँओर मोती सा उभरे हैं बादर।।२।।
जहाँ पगडण्डी हैं खेल दिखाती,
नीति-रीति हैं नित मेल सिखाती।
जहाँ शीतल मन्द समीर है चलती,
कुछ मदमाती तो कुछ है इठलाती।।३।।
प्रदूषण से न है कोई मेल मिलाप,
जहाँ न मिलता प्रकृति का सन्ताप।
धरा में अद्भुत मिलन प्राकृतिक देखो,
जहाँ पहुंचकर न हो कोई पश्चाताप।।४।।