जो बच गये हैं पल, उन्हें अब तो मोलिए

होठों को दे ज़बाँ, अजी! कुछ तो बोलिए,
बन्द कोठरी मे राज़, ज़रा उनको खोलिए।
बेहोश थे तब आप, बड़े बोल बोले थे,
बाहोश अब आप, उन शब्दों को तोलिए।
ग़फ़्लत मे पड़कर वक़्त, यों ही गुज़र गया,
जो बच गये हैं पल, उन्हें अब तो मोलिए।
यों ही किसी ने सोचकर, थमा दी ज़िन्दगी,
ख़याल ऐसा लाकर, न पत्तों-सा डोलिए।
उल्फ़त का तक़ाज़ा, ज़रा मुड़के देखिए,
हमक़दम भी पास, ज़बाँ अब तो खोलिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ जनवरी, २०२४ ईसवी।)