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कुछ यादें ऐसी भी

प्रांशुल त्रिपाठी, रीवा

शायद उस वक्त हम ना समझ या नादान होते हैं ,
जब हम स्कूल में चार दोस्तों के साथ होते हैं ।
हमेशा यही बातें करते हैं कि यार कब हमारा
इस जगह से पीछा छूटेगा ,
कब हमें इन किताबों के गहरे सागर से
बाहर निकलना होगा ।
अब जब हम स्कूल के उन रास्तों से गुजरते हैं ,
तो पता नहीं क्यों अचानक हमारे चेहरे में उदासी छा जाती है ।
और साहसा हमारे मुंह से निकलता है
कि यार ……
स्कूल वाले दिन भी क्या दिन थे ,
जब हम छोटी-छोटी बातों पर शिकायत करते थे l
कि किसी ने मेरी पेंसिल चुराई है,
तो किसी ने मेरी टिफिन खाई है ।
और वो शिक्षकों की बातें जो हमेशा कहते थे
कि तुम लोग गधे के गधे ही रहोगे ,
अभी कुछ पढ़ लिख लो नहीं तो बहुत पछताओगे ।
अब वो बातें याद आती हैं ,
और हम शायद अपने बचपने में खो जाते हैं ।
अब समझ में आया है कि सचमुच वो पल
बहुत ही सुनहरा पल होता है ,
जब हम स्कूल में एक साथ होते हैं ।
अभी तक तो वो बातें थी जब हम स्कूल वाले रास्ते में होते हैं ,
लेकिन अब हम रास्तों से गुजरते हुए स्कूल के सामने आते हैं ।
तो अचानक आंखों में आंसू आ जाते हैं
और लगता है कि अरे यार काश कोई कयामत आ जाए ,
और वह हमारे स्कूल वाले दिन फिर से वापस आ जाएं।

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