युगबोध से शून्य है, मत कर तू! अभिमान

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

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एक–
मद मे अन्धा दिख रहा, बोली बोल कुबोल।
काल विहँसता कह रहा, विष को मत तू घोल।।
दो–
युगबोध से शून्य है, मत कर तू! अभिमान।
आयेगी कब गति-कुगति, नहीं किसी को भान।।
तीन–
दम्भ पालता क्यों यहाँ, नहीं सत्य का बोध?
बोली गोली लग रही, कौन सहेगा क्रोध?
चार–
घड़ा पाप का चल रहा, हर पल तेरे संग।
नख-शिख कृत्य जघन्य है, कलुषित है हर अंग।।
पाँच–
मुदित मुग्ध मनमोहिनी, मन मे मन मत मार।
कल्मष काया कृत करे, भर-भर, भरकर भार।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ अगस्त, २०२३ ईसवी।)