डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
शरीफ ने मजार के पीछे की टूटी-फूटी कोठरी को अपना ठिकाना बना लिया था।
दिन में वह वहाँ कम ही रहता। शाम ढलते ही उसका असली समय शुरू होता।
लोग आते।
अपनी परेशानियाँ बताते।
वह सुनता।
किसी को ताबीज देता, किसी को कोई मंत्र जैसा वाक्य बताता, किसी से अकेले में बात करने को कहता।
गाँव की औरतों के बीच उसकी पकड़ सबसे ज्यादा थी।
वह उनकी मजबूरियाँ जानता था।
किसके पति शहर में रहते हैं।
किसके घर में झगड़ा है।
किसकी बेटी की शादी की चिंता है।
किसकी गोद सूनी है।
किसका बेटा बीमार है।
और जो आदमी दूसरों के राज जानता हो, वह गाँव में धीरे-धीरे डर का दूसरा नाम बन जाता है।
शरीफ ने यही किया।
वह दुआ कम देता था, डर ज्यादा देता था।
“तुम्हारे घर में किसी की नजर लगी है।”
“तुम्हारे पति पर किसी ने बंदिश करवाई है।”
“बच्चे को रात में अकेला मत छोड़ना।”
“अमावस की रात घर से बाहर मत निकलना।”
लोग डरते।
फिर उसी के पास लौटते।
एक रात मजार पर असामान्य सन्नाटा था।
आसमान पर बादल थे और हवा में ठंडक।
शरीफ चबूतरे पर बैठा तस्बीह फेर रहा था।
तभी उसे दूर से कदमों की आहट सुनाई दी।
उसने गर्दन उठाई।
अंधेरे में कोई आदमी पगडंडी से मजार की तरफ आ रहा था।
शरीफ ने आँखें सिकोड़कर देखा।
“कौन?”
कोई जवाब नहीं मिला।
आदमी करीब आया।
उसके कपड़े धूल से सने थे।
चेहरा गमछे से आधा ढका हुआ था।
वह मजार के सामने आकर रुक गया।
कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर उस आदमी ने धीमे से कहा—
“तुम्हें याद है मुझे?”
शरीफ का चेहरा बदल गया।
सिर्फ एक पल के लिए।
लेकिन वह एक पल काफी था।
“नहीं।”
“झूठ।”
शरीफ खड़ा हो गया।
“नाम बता।”
आदमी हँसा नहीं।
उसने बस गमछा थोड़ा नीचे किया।
शरीफ के चेहरे से रंग उतर गया।
“तू…?”
आदमी ने कहा—
“हाँ। मैं।”
कुछ देर तक सिर्फ हवा की आवाज सुनाई देती रही।
फिर शरीफ ने धीमे से पूछा—
“इतने साल कहाँ था?”
“जहाँ तुमने मुझे भेजा था।”
शरीफ की उँगलियाँ तस्बीह पर कस गईं।
“यहाँ क्यों आया है?”
“हिसाब लेने।”
इतना कहकर वह आदमी मुड़ा और अंधेरे में गायब हो गया।
शरीफ बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा।
उस रात उसने पहली बार मजार पर बैठकर दुआ नहीं की।
वह सिर्फ अंधेरे को देखता रहा।