जरूरी काम

मेरे मित्र अजय सिंह चौहान, मैनपुरी वाले हरफनमौला शख्स हैं। हरफनमौला इसलिए कि सरकारी नौकरी में है तो जाहिर सी बात है पढ़े लिखे हैं। इसके अलावा फिजिकल फिटनेस के प्रति भी उतने ही जागरूक हैं । पिछली कोरोना लहर के दौरान उन्होंने अपना वजन 6 किलो कम किया था और इससे भी बड़ी बात कि उस वजन को बरकरार रखे हुए हैं। अजय की तीसरी विशिष्ट खूबी यह कि वह आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं। पे फिक्सेशन, डीए एरियर आदि बताना उनके बाएं हाथ का काम है। शेयर मार्केट जैसे जटिल विषय में भी उनकी गहरी पैठ है। प्रमोटर होल्डिंग, आरओआई, 52 वीक्स हाई-लो जैसे पैरामीटर देखकर वह शेयर के बारे में अपनी राय देते हैं। अजय टेक्निकल चार्ट देख कर बताते रहते हैं कि किस शेयर का सपोर्ट कहां पर है और कौन सा शेयर कब ब्रेकआउट देगा?

इन सब गुणों के कारण उनकी ख्याति दूर- दूर तक फैली हुई है। एक रोज अजय मेरे साथ लंच कर रहे थे, तभी कार्यालय की एक युवती अजय के पास आई और मुस्कुराते हुए बोली-
” अजय जी, मुझे आपसे कुछ बात करनी है??
अजय ने कहा-” हां, बताइये क्या बात है??”
तो उसने कहा-” यहाँ नहीं, कहीं आराम से बैठकर बात करते हैं।”

अजय ने उसके बाद जल्दी से भोजन समाप्त किया, मुंह पानी से धोने के बजाय रुमाल से पोछा, थोड़ी सौंफ खाई और बाहर निकल गए। मेरे साथ टहलने नहीं गए। उस दिन के बाद से अजय ने मेरे साथ टहलना बंद कर दिया। पूछने पर कहते कि “जरूरी काम” है।

मैंने नोटिस किया कि अजय पिछले कुछ दिनों से काफी खुश नजर आ रहे थे। पहले मुझे लगा कि सर्दी अब गुलाबी हो गई है, इसलिए खुश होंगे। या हो सकता है कि फरवरी में केवल 28 दिन काम करने से सरकारी कर्मचारियों को पूरे 30 दिन की तनख्वाह मिलती है, शायद इसलिए खुश होंगे। या उनका कोई शेयर मल्टीबैगर बन गया होगा, शायद इसलिए प्रसन्न होंगे। लेकिन पूछने पर एक ही बात कहते कि ऐसी कोई बात नहीं, बस “अच्छा” लग रहा है।

कल लंच के समय कुछ उदास से लग रहे थे। और आश्चर्य की बात यह कि लंच समाप्त होने के बाद खुद ही बोले कि विनय जी आज आपके साथ टहलने चलेंगे और दूर तक चलेंगे। इस पर मैंने चुटकी ली कि-
“आज ‘जरूरी काम’ नहीं है क्या?”
तो वह तपाक से बोल पड़े कि-” नहीं, वह काम खत्म हो गया। “
“इतनी जल्दी”
“हां, यार। वह बहुत अजीब सी जीव है। भगवान ने उसको दिमाग तो खूब दिया है, दिल इंस्टॉल करना भूल गए। जब भी मिलती है तो पे फिक्सेशन, इन्वेस्टमेंट, इन्सुरेंस पॉलिसी, रिटायरमेंट बेनेफिट आदि के बारे में ही बात करती है।”

मैं इस उम्मीद में उसके साथ टहलता रहा कि कभी तो कुछ काम की बात करेगी ।

आज रोज़ डे पर बड़ी उम्मीद के साथ उसे गुलाब दिया। उसने झट से गुलाब ले लिया तो मुझे लगा कि बात बनने वाली है। वह कुछ देर तक गुलाब देखती रही फिर बोली- “कितने का मिला?”
तो हमने भी कह दिया -” अरे भाग्यवान, भावनाओं को समझो, कीमत पर क्यों जाती हो?”

इस पर वह बड़ी मासूमियत से बोली-” मैं तो इसलिए पूछ रही थी कि हमारे एरिया में सस्ता मिल जाता है।”

यह सुनते ही अजय का दिल टूट गया। अब अजय का अर्थशास्त्र से मन भर गया है। आज रास्ते भर गालिब का यह शेर गुनगुनाते रहे–

“यह कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह ।
कोई चारासाज होता, कोई गम गुसार होता ।।”

(आशा विनय सिंह बैस)