जीवन का सारांश : पति-पत्नी-संवाद
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पत्नी : सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़। कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।। हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह। खटपट भी होता रहे, अलग न […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय पत्नी : सम्बल अपनी बाँह का, कभी न देना छोड़। कितना भी संकट रहे, दु:ख से करना होड़।। हर जन्म हम संग चलें, ऐसी अपनी चाह। खटपट भी होता रहे, अलग न […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ हमारे प्रिय नेताजी छीन-झपट कर बैठे न सुधरे जनता से छल-कपट कर बैठे । सड़कें ख़राब थी बिजली भी नहीं आती हम बिजली के बटन चट-पट कर बैठे । दिमाग़ आज हमारा बहुत ख़राब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यूँ फँसा पड़ा था उलझनों में कहीं इक अर्सा बीत गया अब जब देखी है तस्वीर तेरी दिल में प्यार उमड़ पड़ा मोहब्बत की गहराई मेरी मालूम है उसे या ख़ुदा क्यों खुद ही में वो उलझ के रह गया ।
ज़िंदगी अब इक तंज़ बन के रह गई बिन तेरे दुनिया रंज बन के रह गई । नाख़ुदा कौनसी स्याही से मानेगा अश्कों का रंग भी अब सुर्ख़ हो गया । बिखर गया हूँ कुछ इस तरह से कि इक टुकड़ा फलक पे दुसरा ज़मीं-दोज़ हो गया । रह रह के देखता हूँ मुड़ के पीछे बवंडर लूट के मुझे ख़ामोश हो गया । डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुबह आती आवाज़ें शाम आती आवाज़ें दिन और रात आती आवाज़ें वक़्त तक आती आवाज़ें वक़्त को रोकती आवाज़ें आवाज़ों का ट्रैफिक जाम है, क्योंकि हर दिशा से एक साथ आती हैं कई आवाज़ें।
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : कैसा यह भगवान् है, चोर-चमारी भक्ति। मन्दिर में मूरत दिखे, उड़न-छू भयी शक्ति।। दो : पट्टी बाँधे आँख में, देश जगाता चोर। भक्त माल सब ले गये, कहीं नहीं अब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ सुना है ज़माने के साथ लोग बदलते हैं शहर में कुछ पीर आजकल भी रहते हैं । आँख भरके देखते हैं क़द्र न की जिसने मचलते हैं क्यों इतना पूँछ के देखते हैं । चाँद से बढ़ कर रोशन सादगी जिनकी हर दिन वो शान से बाहर निकलते हैं । हुजूम से परे उन पर निगाहें ठहर गई तितलियाँ मँडरातीं हैं शायद महकते हैं । उतरे चेहरे सँवार के भी ख़ामोश बहुत जहाँ भर की ख़ुशी आस पास रखते हैं । तिरे पीछे तिरि परछाँइयों से की बातें चश्म हैराँ मिरि अक़्स कमाल करते हैं । मुंसिफ-ए-बहाराँ तिरि एक नज़र को ‘राहत’ तेरे कूचे से दिन रात गुजरते हैं ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते ह़ैं सूरज से डरते हैं इसीलिये दिन में छिप जाते हैं। चाँद से शरमाते है पर आकाश में निकल आते ह़ैं तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं। लोग कहते हैं अंतरिक्ष अनंत ह़ै लेकिन मैंने देखा नहीं मैं तो केवल इतना जानता हूँ सूरज बादल में छिप जाता है चाँद बादल में छिप जाता है सो तारे जब डरते शरमाते होंगे बादल में छिप जाते होंगे। तारे घबराते हैं शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ माना कि हालात बेकाबू हो गए कई बार जब भी वक़्त नासाज हुआ हर बार भरोसा रखा मैंने या ख़ुदा तेरे भरोसे को क्या हुआ कभी लगता है सँभल गया कभी यों ही बिगड़ गया वक़्त ऐसा जैसे रेत का बुत मुठ्ठी से फिसल गया रोकना तो चाहा हमेशा पर लम्हा इतना अजीब है क्यों न समझ सका वो तड़प दिल की साथ रहकर भी छोड़कर तुम जहां से गए थे मैं आज भी वहीँ खड़ा हूँ यूँ तुम तो सम्हल गए होगे मैं आज भी बिखरा पड़ा हूँ इस दिल में रहोगे ता-उम्र फिर क्यूँ डरते हो पाक है मोहब्बत मेरी यूँ नजरे चुरा के ना निकलो इंतिज़ार है तेरे इक इशारे का आगे खूबसूरत जहाँ पड़ा है तेरे बिना वर्ना दर्द का दरिया ‘राहत’ आँखों से बहता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ कुछ लोग मंदिर को मदिरालय से मस्जिद को मय-ख़ाने से जोड़ गए । आस्था से खेला संवेदनाओं को चक्कर में छोड़ गए । और नासमझ मनुष्य मंदिर से मदिरालय के मस्जिद से मय-ख़ाने के रिश्ते पर यकीं कर बैठा ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ रखता हूँ हर कदम ख़ुशी का ख़याल अपनी डरता हूँ फिर ग़म लौट के न आ जाए । अब भुला दी हैं रंज से वाबस्ता यादें यूँ आके ज़िंदगी में ज़हर न घोल जाएँ […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ़) राजस्थान मुसीबत के समंदर में जो किनारा दे वो है मेरी माँ, जीने के मायने जो सिखाये वो हैं मेरी माँ। औलाद उदास हो तो मुस्कान चेहरे पर लादे वो हैं […]
राजेश पुरोहित भवानीमंडी, जिला झालावाड़, राजस्थान ढलेगी रात अंधियारी, सुबह फिर सूरज निकलेगा। जो ख्वाबों में दिखा तुमको, वह हकीकत में दिखेगा।। घर घर की कहानी वही पीढ़ी का अंतर देखा। नई पीढ़ी चाहे आज़ादी,पुरानी […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ़ ) राजस्थान भाई और बहन हो जाओ तैयार, लो आ गया राखी का त्योहार । ठंडी बारिश की बूँदे, सावन की सौंधी महक। भाई के आने की उम्मीद बहना को लगी […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ) धन की लालसा मन में जगाते हो, बेटी को पराया धन बोल गर्भ में गिराते हो। कहते है ,के बेटा वंश बढायेगा, यदि बहू न आई आंगन तो किलकारी कौन गूंजायेगा। […]
श्री गणेश मनावर जिला धार (मप्र ) के वरिष्ठ कवि श्री शिवदत्त जी “प्राण ” ने लगभग 60 वर्ष पूर्व गणेश जी की स्वरचित आरती लिखी थी जो पूरे मनावर एवं आसपास के क्षेत्रों में संगीत […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ जब दूर बैठा कवि कोई, सर्जन के बीज बोता है, भाव में खुद को पा कर, मन में हर्ष का तीज़ होता है। जब दूर…………………………………………………. उठी जैसे लहर कोई, नया अनुबन्ध करने को, […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ), राजस्थान ऐ विघ्नहर्ता ऐ मंगलकर्ता तू ही दुखहर्ता तू ही सुखकर्ता, एकदंत गजबदन को मेरा बारंबार प्रणाम । चारों ओर मची है धूम गणेश उत्सव की, जीवन में छाई नई आशा […]
शालू मिश्रा, नोहर (हनुमानगढ), राजस्थान मन ये तेरा परेशान क्यूँ है, इस जग से बेफिक्र क्यूँ है, नित नये ख्वाब सजा कर मन में दबा बैठा क्यूँ है। पथ पर नित आगे बढ चल न […]
कवि राजेश पुरोहित, श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी, मोबाइल 7073318074 म्हारे गणपति न्योतो देवूं सा थें तो बेगा पधार जो म्हारी विनती सुण लीजो ओ गणपति बेगा पधार जो मूषक सवारी देवा आप बिराजे फुलां का मैं […]
कवि – राजेश पुरोहित रोज – रोज तेल के भाव चढ़ रहे। सियासत में तूफान भी मच रहे।। विपक्ष के नेता हाहाकार कर रहे। जनता के प्रदर्शन रोज ही हो रहे।। आने वाले अब अगले […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” ज़िंदगी के रंग मंच पर आदमी है सिर्फ़ एक कठपुतली । कठपुतली अपनी अदाकारी में कितने भी रंग भर ले आख़िर; वह पहचान ही ली जाती है, कि वह मात्र एक कठपुतली है । ऐसे ही आदमी चेहरे पर कितने ही झूठे-सच्चे रंग भरे अंत में, रंगीन चेहरे के पीछे असली चेहरा पहचान ही लिया जाता है |
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ जिस सहर पे यकीं था वो ख़ुशगवार न हुयी देखो ये कैसी अदा है नसीब की समझा था जिसे बेकार, वो बेकार न हुयी मांगी थी जब तड़प रूह बेक़रार न हुयी कहूँ अब क्या किसी से देखकर माल-ओ-ज़र भी मिरि चाहतें तलबगार न हुयीं सोचा था जिन्हे अपना वो साँसें मददगार न हुयीं है अजीब अशआर क़ुदरत की भूल से छोड़ा था जिसे हमने वो निगाहें शिकबागार न हुयीं २५/०१/०३ टैगोर हॉस्टल, सागर यूनिवर्सिटी
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत‘ जवानी जो आई बचपन की हुड़दंगी चली गई दफ़्तरी से हुए वाबस्ता तो आवारगी चली गई । शौक़ अब रहे न कोई ज़िंदगी की भागदौड़ में दुनियाँ के दस्तूर में मिरि कुशादगी चली गई […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) कन्हैया बस यही विनती मेरी स्वीकार कर लेना, मेरी डगमग-सी नैया को ये दरिया पार कर देना। सबकी बिगड़ी बनाते हो , सभी को राहें दिखाते हो। कहीं गोपी सङ्ग लीला, कहीं […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) गिरते मन को उठाना सिखाया है जिसने, घोर तम में दीये को जलाया है जिसने। उस गुरु की हृदय से इबादत करूँ मैं, भटके क़दमों को राहों में लाया है जिसने।। **** […]
डॉ. रूपेश जैन मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था ख़ाहिश-ए-ख़लीक़ इज़हार करना चाहा था । धुएँ सी उड़ा दी आरज़ू पल में यार ने मिरि तिरा इस्तिक़बाल शानदार करना चाहा था । भले लोगो की बातें समझ न आईं वक़्त पे मैंने तो हर लम्हा जानदार करना चाहा था । तिरे काम आ सकूँ इरादा था बस इतना सा तअल्लुक़ आपसे आबदार करना चाहा था । इंतिज़ार क्यूँ करें फ़स्ल-ए-बहाराँ सोचकर चमन ये ‘राहत’ खुशबूदार करना चाहा था ।
कवि राजेश पुरोहित महावीर के सिद्धांतों को जिसने जग में फैलाया। दिगम्बर रह कर जीवन में सच्चा संत कहलाया।। तन पर न कोई वस्त्र रखा रखी धर्म की लाज सदा। मुनि तरुण सागर ने अमृतवाणी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सदियों से भटकती इक तलाश लिखता हूँ , हवा,पानी,आँधी और बतास लिखता हूँ। सूख रही ताल-तलय्या दूभर है अब पानी, इस काइनात१ की अब लिखता हूँ हमक़दम दग़ा दे गया कुछ […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” इंसानियत से प्यार जब दीन-ओ-जान हो जायेगा मुज़्तरिब हाल में हाथ थामना ईमान हो जायेगा रस्म है, ज़िंदगी करवटें बदलती रही इब्तिदा से शिद्दत से जिया जो मालिक मेहरबान हो जायेगा ख़ुद से मुलाक़ात […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” दिन हो, रात हो अब युवा हिन्द के करते आराम नहीं समाज बदल रहा है युवा, व्याकुलता का अब काम नहीं भारत माता की वेदी पर निज प्राणों का उपहार लाये हैं शक्ति भुजा में, ज्ञान गौरव जगाने भारत के युवा आये हैं नित नए प्रयासों से समाज को आगे ले जा रहे है देखो युवा क्या क्या नये उद्यम ला रहे है बिन्नी के साथ ‘फ्लिपकार्ट’ आया देश में नया रोजगार लाया कुणाल और रोहित की ‘स्नैपडील’ कंस्यूमर को हो रहा गुड फील देश की बेटियाँ कहाँ पीछे रहीं राधिका की ‘शॉप-क्लूज़’ आ गयी हुनर नहीं बर्बाद होता अब तहखानों में जीवन रागनियाँ मचल रही नव-गानों में समझ चुके हैं बिना प्रयास पुरुषार्थ क्षय है आगे बढ़ चले अब, भारत माता की जय है तप्त मरु को हरित कर देने की आस लगाये हैं युवा सुख-सुविधाओं की नए परम्परा लाये है भाविश का ‘ओला’ समय से घर पहुँचता शशांक का ‘प्रैक्टो’ डॉक्टर से मिलवाता दीपिंदर का ‘जोमाटो’ खाना खिलवाता समर का ‘जुगनू’ ऑटोरिक्शा दिलवाता विजय का ‘पेटीऍम’ ट्रांजेक्शन की जान सौरभ, अलबिंदर का ‘ग्रोफर्स’ खरीदारों की शान शिरीष आपटे की जल प्रणाली देश के काम आ रही बीएस मुकुंद की ‘रीन्यूइट’ सस्ते कंप्यूटर बना रही बिनालक्ष्मी नेप्रम ‘वुमेन गन सर्वाइवर नेटवर्क’ चला रहीं सची सिंह रेलवे स्टेशन पर लावारिसों […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” भावनाओं का निर्मल सलिल हृदय से गुज़रते ही दर्द की आग में उबल पड़ता है और निष्क्रिय मस्तिष्क फिर वापस पीछे धकेलते हुए शरीर निष्प्राण सम कर देता है हर डगर यूँ तो कठिन […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय उठती है हर लहर आँखों के सामने , गिरती है हर लहर आँखों के सामने। सभ्यता की अगुवाई बेहयाई कर रही, आँखों का पानी मर रहा आँखों के सामने। पाक़ीज़गी से […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इंसाँ झूठे होते हैं इंसाँ का दर्द झूठा नहीं होता इन होंठों पर भी हंसी होती गर अपना कोई रूठा नहीं होता। मैं जानता हूं कि आंखों में बसे रुख़ को मिटाया नहीं जाता, यादों में समाये अपनों को भुलाया नहीं जाता। रह–रहकर याद आती है अपनों की ये ग़म छुपाया नहीं जाता, सपनों में डूबी पलकों की कतारों को यूं उठाया नहीं जाता। इंसाँ झूठे होते हैं इंसाँ का दर्द झूठा नहीं होता इन होंठों पर भी हंसी होती गर अपना कोई रूठा नहीं होता।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ बूढ़े दरख़्त पहले से ज़्यादा हवादार हो गये इश्क़ में हम पहले से ज़्यादा वफ़ादार हो गये । उनसे दिल की बात कहने का हुनर सीख लिया लब-ए-इज़हार पहले से ज़्यादा असरदार हो गये […]
युगपुरुष को सादर श्रद्धांजलि डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी साँसो का बंधन तोड़ , यादों की गठरी छोड़ , राष्ट्रपंथ के पथिक , तू भला किधर गया ? एक युग ठहर गया ………… वह थे अजातशत्रु, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सुगबुगाहट हो तो, अब आग उठनी चाहिए, हो कहीं भी आग तो, आग लगनी चाहिए। बहुत सोये हो तुम! अब जग जाने को सोचो, उठाओ अब मशाल, लपट उठनी चाहिए। बूढ़ा भारत […]
दीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761 सत्ता चरित्र है बड़ा विचित्र सत्ता चरित्र, उजले चेहरे धुंधले होते हम आम सुधी जन, लाख जतन कर सच्चाई को समझ ना पाते हाथ रगड़ते फिर पछताते ।। […]
प्रदीप कुमार तिवारी, करौंदी कला, सुलतानपुर 7537807761 गिरती है सीमा पर लाशें चैन से हम तुम सोतें हैं। भूख से व्याकुल बच्चे उस दिन, सैनिक के घर रोते हैं।। हम शहीद कह के उनको, काम […]
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ (पत्रकार, बघौली, हरदोई) ऊँश्री गुरूवे नमः गुरू सर्वोपरि 15 अगस्त 2018 स्वतन्त्रता दिवस अमर रहे ! राष्ट्रीय पर्व के अवसर मौलिक मनभावों के पुष्प आदर श्रद्धा से सादर समर्पित हैं। (1) देश […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ छोटे से दिमाग़ में बसा ली है दुनियाँ चारों और कौन देखता है चौंतीस हो गयीं बर्बाद मुजफ्फरपुर कौन देखता है । उन्नाओ, सूरत, मणिपुर, दिल्ली कौ नसा हिस्सा बचा मेरे हिन्दुस्तान अब रोना आता है मुझको बच्चियाँ लाचार, कौन देखता है । जब तक बीते न ख़ुद पे बड़े व्यस्त हैं हम चलो प्रार्थना ही करलें पुकारें बेटियाँ कौन देखता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ छोटे से दिमाग़ में बसा ली है दुनियाँ चारों और कौन देखता है चौतीस हो गयीं बर्बाद मुजफ्फरपुर कौन देखता है । उन्नाव, सूरत, मणिपुर, दिल्ली कौनसा हिस्सा बचा मेरे हिन्दुस्तान अब रोना आता है मुझको बच्चियाँ लाचार, कौन देखता है । जब तक बीते न ख़ुद पे बड़े व्यस्त हैं हम चलो प्रार्थना ही करलें पुकारें बेटियाँ कौन देखता है ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ गले लगते दोस्त बोला क्या छोड़ दिया चैन से जीना सीख लिया सारा दिन फेसबुक पर रहना छोड़ दिया चैन से जीना सीख लिया । व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी हर रोज नए पचड़े सर दर्द […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय किसी की बात पर न जाइए हुज़ूर ! किसी की बात पर न आइए हुज़ूर ! दीगर बात है कोई बात ही नहीं, भरा हो पेट तो मत खाइए हुज़ूर ! ज़ख़्मों […]
डॉ रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद कुछ ख़्वाब बुन लेना जीना आसान हो जायेगा दिल की सुनलेना मिज़ाज शादमान हो जायेगा मुद्दत लगती है दिलकश फ़साना बन जाने को हिम्मत रख वक़्त पे इश्क़ मेहरबान हो जायेगा टूटना और फिर बिखर जाना आदत है शीशे की हो मुस्तक़िल अंदाज़ ज़माना क़द्रदान हो जायेगा लर्ज़िश-ए-ख़याल में ज़र्द किस काम का है बशर जानें तो हुनर तिरा मुल्क़ निगहबान हो जायेगा मंज़िल-ए-इश्क़ में बाकीं हैं इम्तिहान और अभी ब-नामें मुहब्बत ‘राहत’ बेख़ौफ़ क़ुर्बान हो जायेगा ॥
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक) डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय वक़्त-बेवक़्त की स्याह परछाइयाँ चुपके से दाख़िल होती हैं मेरे अँधेरे घर में। घर के भार से लहूलुहान नीवँ कब दम तोड़ देगी, इसे वक़्त भी नहीं […]
‘डॉ रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद मैं क्या मिरी आरज़ू क्या लाखों टूट गए यहाँ तू क्या तिरी जुस्तजू क्या लाखों छूट गए यहाँ । चश्म-ए-हैराँ देख हाल पूँछ लेते हैं लोग मिरा क़रीबी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बीज घृणा का हर तरफ़, उगने लगी खटास। हाथ प्रेम ने झटक लिये, दूर हो गयी आस।। गोरखधन्धा दिख रहा, खेल निराले खेल। बाहर से दुश्मन लगें, अन्दर से है मेल।। राजनीति […]
************************************** जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) अभिनन्दन की आस लिए मैं जीवन जीता जाता हूँ। कर्मयोग का साधक मैं नित भगवत्- गीता गाता हूँ।। अभिनन्दन की……………………….………….. भेद-भाव के इस कानन में स्वाभिमान का प्रहरी हूँ, प्रेम-भाव में […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सवाल तुमसे, बीमार बीज क्यों बोते हो? जवाब देते ही अतीत को तुम रोते क्यों हो? मज़ा तब है, जब पर्वाज़ में बलन्दी हो, जागते हो कथनी में और करनी में सोते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ख़ुशियाँ हुईं बरबाद, मुझे कोई ग़म नहीं, जानता था, तुम सबमें, है कोई कम नहीं। इत्तिफ़ाक़ था उस रोज़, मिल रहे थे सब गले, पीठ पे निशाना, लगानेवालों में हम नहीं। सीना […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बज़्मे-महफ़िल की शान है कोठा, दौलत और हुस्न का ईमान है कोठा। यों ही नहीं बनती रक़्क़ाशा जान लीजिए, लाचारी-मज्बूरी का नाम है कोठा। तवायफ़ का जिस्म है रंगीनिये-शवाब, रंगीनिये-हयात की पहचान […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सृष्टि का जो अंश पल रहा है तुम्हारी कोख में उसे न तो ‘राम’ की माला पहनाना और न बाँधना ‘रहीम’ की ताबीज़। उसे रहने देना सिर्फ़ उस इंसान की सन्तान, जिसका […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय शाम ढली दीये को जलने दो, नींद में सपनों को पलने दो। प्यास बढ़ती है तो बढ़ जाए, बर्फ़ को पानी में गलने दो। दम न तोड़ ले ख़्वाहिश कहीं, उसको अब […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद नज़ाकत-ए-जानाँ1 देखकर सुकून-ए-बे-कराँ2 आ जाये चाहता हूँ बेबाक इश्क़ मिरे बे-सोज़3 ज़माना आ जाये मुज़्मर4 तेरी अच्छाई हम-नफ़्स मुझमे, क़िस्मत मिरी लिखे जब तारीख़े-मुहब्बत5 तो हमारा फ़साना आ जाये माना हरहाल मुस्कुराते रहना […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’, ज्ञानबाग़ कॉलोनी, हैदराबाद उम्र भर सवालों में उलझते रहे, स्नेह के स्पर्श को तरसते रहे फिर भी सुकूँ दे जाती हैं तन्हाईयाँ आख़िर किश्तोंमें हँसते रहे । आँखों में मौजूद शर्म […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत” क्या रखा है तेरी याद में उम्र भर बे-सुकून क्यों जीते रहें उम्र भर दिल-लगाया-ओ-इश्क़-आजमाया तमन्ना क्यों सताती रहे उम्र भर हँसता हूँ ख़्याल पे कि तुम मेरे हो ग़ैरों को क्यों तड़पते रहें […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ पाने की चाह में खोने का डर सताता है बिना कुछ पाये ही दिल सहम जाता है फ़ितरत में जुड़ा है ये डर जाना सहम जाना रुका था न रुकेगा इंसाँ […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ एक दिन मेरे दोस्त को, मैं लगा गुमसुम बोला वो, क्या सोच रहे हो तुम बातें बहुत सी हैं सोच रहा हूँ, क्या सोचूँ, बोला मैं। अलग-अलग हैं कितनी बातें […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ ना कुछ सोचो ना कुछ करो, क्योंकि चाय के प्यालों से होठों का फासला हो गयी है जिंदगी। भूख से बिलखती रूहों को मत देखो शान-औ-शौकत के भोजों१ में खो गयी है जिंदगी। बस सहारा ढूढ़ते, सड़क पे फट गए जूतों से क्या सुबह शाम बदलती गाड़ियों का कारवाँ हो गयी है जिंदगी। तन पे फटे हुए कपडे मत देखो नए तंग मिनी स्कर्ट सी छोटी हो गयी है जिंदगी। पानी की तड़प भूल कर महंगीं शराब की बोतलों में खो गयी है जिंदगी। फुटपाथ पे सोती हजारों निगाहों की कसक छोड़ के इक तन्हा बदन लिए, हजारों कमरों में सो गयी है जिंदगी। हजारों सवाल खामोश खड़े; बस सुलगती सिगरेट के धुएं सी हो गयी है जिंदगी। शब्दार्थ: १. भोजों:- दावतों
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक —–पाप-बोध—- पाप का कण-कण मेरी जिह्वा से टकराता है और ले जाता है– एक ऐसे गह्वर में, जहाँ पुण्य का प्रताप आन्दोलित हो रहा है और मेरा पाप सिर चढ़ कर […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ अपनी तमन्नाओं पे शर्मिंदा क्यूँ हुआ जाये एक हम ही नहीं जिनके ख़्वाब टूटे हैं इस दौर से गुजरे हैं ये जान-ओ-दिल संगीन माहौल में जख़्म सम्हाल रखे हैं नजर उठाई बेचैनी शर्मा के मुस्कुरा गयी ख़्बाब कुछ हसीन दिल से लगा रखे हैं दियार-ए-सहर१ में दर्द-शनास२ हूँ तो क्या बेरब्त उम्मीदों में ग़मज़दा और भी हैं अहद-ए-वफ़ा३ करके ‘राहत’ जुबां चुप है वर्ना आरजुओं के ऐवां४ और भी है शब्दार्थ: १. दियार-ए-सहर – सुबह की दुनियाँ २. दर्द-शनास – दर्द समझने बाला ३. अहद-ए-वफ़ा – प्रेम प्रतिज्ञा ४. ऐवां – महल
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब ख़ुद को लुटा दो, वतन के लिए, अब ख़ुद को खिला दो, चमन के लिए। ये आसां नहीं, जितना समझते हो तुम, तरस जाओगे दो गज़, कफ़न के लिए। बेशक, ज़माना […]
पेशे ख़िदमत हैं, चन्द अश्आर डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- एक : तुम्हारी क्या बिसात, जो मुझे ललकारोगे? शब्द-तीर चलने पर, शेर भी दहल जाते हैं। दो : कुछ कर सकने की औक़ात नहीं, तो चुप बैठो, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय भूख से बिलबिलाती आँतें; चीथड़ों में लिपटी-चिपटी अपनी पथराई आँखें पालती; टुकुर-टुकुर ताकती आँखों से झपटने की तैयारी करती मेले-झमेले की गवाह बनती; आस-विश्वास की फटही झोली लिये तमन्नाओं-अरमानों की लाश ढोती […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय सिर पर कफ़न, बाँध कर आ गया, सीने पर पत्थर, दबाकर आ गया। शिकवा, शिकायत, गिला भी नहीं, अफ़साना अब जलाकर आ गया। मुफ़्लिस कैसे, कह दिया उसने? ख़ज़ाना दिखाकर, उसे आ […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) मैं प्रेम पथिक आवारा भँवरा, काँटों से भी प्यार करूँ, अधर लिखें चुम्बन की पाती, नयनों से संवाद करूँ। ऋतु वसंत की मादकता हो, या पावस के भारी दिन, उर में बजती नित […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बउराइ गइल मनवाँ, अझुराइ गइल मनवाँ। कबो घाम कबो छाहीं, खउराइ गइल मनवाँ। झमझमाझम बूनी, सझुराइ गइल मनवाँ। सोझा तहरा होखते, भहराइ गइल मनवाँ। आ ओकरा चिंहुकला से अगराइ गइल मनवाँ। (सर्वाधिकार […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बातों-ही-बातों में, ‘आदर्श’ अब बँटने लगे, जनाब को देखो, मुद्दों से, कैसे हैं हटने लगे! राम तो राजसिंहासन, त्याग कर आगे बढ़े, कैसे रामभक्त हैं, जो कुर्सी से सटने लगे! आश्वासन देते […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- जो उजड़ गया वह दयार हूँ, जो बिछड़ गया वह प्यार हूँ। कुछ याद आये तो कहो, जो बिसर गया वह क़रार हूँ। इल्ज़ाम सिर पर है मेरे, क़ातिल नहीं, फ़रार हूँ। […]
आज एक जुलाई है आषाढ़-मास है। कवि-कलाधर, कवि-कुसुमाकर, कवि-सम्राट कालिदास का ‘मेघदूत’ जीवन्त हो उठता है। पावस-ऋतु का आगमन और सम्प्रति, वर्षा की मूसलाधार प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों के गह्वर में छोड़ आती हैं। अन्तहीन-सी बूँदें ग्रीष्म की […]
©जगन्नाथ शुक्ल….✍ (इलाहाबाद) किस हक़ से कहते हो कश्मीर हमारा है, खुद के हाथों भारत माँ का शीश उतारा है। ग़र चाहत है खुशियाँ बरसें लहराये केसर घाटी में, ३७०धारा ख़तम करो,धरती ने आज […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कुर्सी है माई-बाप, अवसर हैं कुर्सियाँ, कुर्सी है छल-छद्म, हिंसक हैं कुर्सियाँ। जिस राह पे चलो, ख़ूब देख-भाल कर, क़ानून को भी आईना, दिखातीं कुर्सियाँ। ग़रीब का चूल्हा है, उधारी में […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बेशक, तुम्हारे चिन्तन चुराये हुए हैं। किराये की कोख से जन्मे या फिर परखनली में उपजे तुम्हारे वे शब्द हैं, जिन्हें पक्षाघात ने जकड़ लिया है। कोई थिरकन नहीं? प्रतिक्रिया-रहित संवेदना-शून्य तुम्हारा […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय रात घिरती रही, दीप जलता रहा। साज-श्रृंगार+ करती रही ज़िन्दग़ी, रूप भरती-सँवरती रही ज़िन्दग़ी। बेख़बर वक़्त की स्याह परछाइयाँ, उम्र चढ़ती-उतरती रही ज़िन्दग़ी। साध के फूल कुँभला गये द्वार पर, प्यास की […]
रे रे झरने, तेरा निनाद ! सुनकर बज उठता ह्रदय-नाद । अन्तस् में भरता, आह्लाद । सानन्द दृशा, लगतीं भरने । रे रे झरने ! प्यारे झरने ।। तेरा प्रलाप, कल-कल कुल-कुल, हर धार चपल, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय निभृत-निलय में वितान तानता मन, निश्शब्द-मूक याचना– सम्पृक्त उर्वशी-मेनका का तन। अनाघ्रात पुष्प-सा– सर्वांग सौन्दर्यस्वामिनी-द्वय की कान्ति, समग्र संसार-संसूचित– कमनीय कामिनी के क्लान्त कपोलों की भ्रान्ति। रूप, रस, गन्ध स्पर्श का आकर्षण, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : देखते-ही-देखते, हम बाज़ार हो गये, सपनों के सारे यहाँ, ख़रीदार हो गये। गरदन झटक पंछी-मानिंद, उड़ते रहे जो, बेशक, वही अब हमारे, तलबगार हो गये। दो : ज़िन्दगी से छेड़ख़ानी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय समग्र भारत का परिधान है हिन्दी, राष्ट्रीय आन-बान औ’ शान है हिन्दी। भाषाओं में है शीर्ष स्थान पर स्थित, जीवन-मरण का आख्यान है हिन्दी। आओ! करें नमन अपनी राजभाषा को, हमारे आचरण […]
एक अभिव्यक्ति डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय महसूस तो अब होता है बहुत, ज़िन्दगी को है उलझाया बहुत। पाया कब और खोता रहा कहाँ, इन प्रश्नों को है सुलझाया बहुत। हर चौराहे पर प्रश्न लटकते रहे, लोकसत्ता […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : शुष्क पड़ी संवेदना, घायल रक्त-सम्बन्ध। अजब खेल है मोह का, कैसा यह अनुबन्ध? दो : मेरा-तेरा किस लिए, माया से अब डोल। गठरी दाबे काँख में, द्वार हृदय का खोल।। […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक : कल तक था जो जगद्गुरु, भ्रष्ट बन गया देश। दिखते सब बहुरुपिये, तरह-तरह के वेश।। दो : कुम्भकर्णी सब नींद में, नहीं किसी को होश। बाँट देश को सब रहे, […]
कवि राजेश पुरोहित (राजस्थान) योग आत्मा से परमात्मा का मिलन निर्मलता स्वच्छता का संदेश मानसिक शांति का उपाय तन बने सुदृढ़ मन मे जगे आत्मविश्वास नई उमंग नई चेतना नई स्फूर्ति नए उल्लास का उदय […]
जयति जैन “नूतन”, भोपाल (युवा लेखिका , सामाजिक चिंतक) पिता ही तो थे वो जिन्होनें हर ख्वाहिश पूरी की थी कोई क्या समझ सकेगा उस स्नेह से भरे अगाध प्रेम को । वर्षों तक पसीने […]
जगन्नाथ शुक्ल…✍ (इलाहाबाद) चले आये थके-हारे ,इन जज़्बातों के सहारे ही, ये दिल मत तोड़ना पगली,जो धड़के तेरे सहारे ही। इसे मत भूल जाना तुम,इसका अपमान मत करना, बड़ा मासूम-सा ये दिल, इसे मजबूर मत करना। […]
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ वेष दिगम्बर धारी मुनिवर करुणा अब जगाएँगे पार करो खेवैया नहीं तो हम भव में ठहर जाएँगे । भक्ति भाव से आपको पुकारें हे! विशुद्ध महासंत कृपा प्रकटाओ अपनी नहीं तो […]
राघवेन्द्र कुमार “राघव”- अन्त:विचारों में उलझा न जाने कब मैं, एक अजीब सी बस्ती में आ गया । बस्ती बड़ी ही खुशनुमा और रंगीन थी । किन्तु वहां की हवा में अनजान सी उदासी […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय इक हूक-सी उठी है अब क्या कहूँ तुम्हें? ज़ख़्मी तन-बदन है अब क्या कहूँ तुम्हें! हर रात मुझसे रूठी दिन भी उदास है, क़दम भी बहके-बहके अब क्या कहूँ तुम्हें? इक अनकही […]
राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’- धरती का सीना फाड़ अन्न हम सब उपजाते हैं | मेहनतकश मज़दूर मगर हम भूखे ही मर जाते हैं | धन की चमक के आगे हम कहीं ठहर न पाते हैं […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हिचकी का सबब क्या है, बताइए हुज़ूर! परेशाँ हाले दिल को, अब सुनाइए हुज़ूर! कब तक भरमाइएगा, बाज़ीगरी दिखा के, चेहरा पे चेहरे अब तो न, लगाइए हुज़ूर! लोग आपकी हक़ीक़त से, […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अब हथेली पर सूरज उगाता हूँ मैं, अपनी आँखों में चन्दा बसाता हूँ मैं। सीने में दहकता है आग का गोला, भूख लगने पर उसको चबाता हूँ मैं। आँखों में उग आये […]
सुधीर अवस्थी परदेशी मां लिखूं तेरे बारे में क्या, वाक्य बनते हैं नहीं। गद्य-पद्य कहूं क्या मैं, आंसू थमते हैं नहीं।। प्रेम तेरा प्यारा इतना, तुमसा नहिं कोई और है। हूं अंधेरी रात मैया, तू […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय कौन-सा अपराध! कैसी गुस्ताख़ी! मैं तो था, मात्र मांस का एक लोथड़ा। शक़्ल अख़्तियार करने से पहले ही मेरे वजूद को मिटा डाला? तुम ममत्व और अपनत्व के द्वन्द्व में उलझी रही, […]
शोकपूर्ण अभिव्यक्ति :———— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- मनसा-वाचा-कर्मणा, सौ में शून्य पाय। बटन दबाना सोचकर, जाये मुँह की खाय।। बात मन की बिसर गया, तन में खोजे प्रीत। क़िला हवा में बन रहा, बालू की है […]
कवि राजेश पुरोहित अभिनेता फ़िल्म कम राजनीति में ज्यादा अच्छा अभिनय करते जय जय भारत जान से प्यारा देश हमारा भारत प्यार ढाई अक्षर का सुंदर नाम रखो याद सदा तिरंगा दिल में रहता है […]