एक ग़ज़ल : सलीक़ा सीखकर भी वे ‘सीख’ न सके
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आँखों-आँखों में, सलाम ले लिये, बन्द होठों से वे, पयाम ले लिये। लब थरथरा गये, मंज़र को देखते, नज़रें ज्यों झुकीं, वे सलाम ले लिये। होठ खुले, अधखुले, बन्द हो गये, जाने […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय आँखों-आँखों में, सलाम ले लिये, बन्द होठों से वे, पयाम ले लिये। लब थरथरा गये, मंज़र को देखते, नज़रें ज्यों झुकीं, वे सलाम ले लिये। होठ खुले, अधखुले, बन्द हो गये, जाने […]