महेन्द्र महर्षि (गुरुग्राम) से. नि. प्रसारण अधिकारी-
“मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूँ” , संभवत: अपनी आत्म कथात्मक पुस्तक का उन्होंने यही नाम रखा। मैं उस पुस्तक की माँग उनसे करता ही रह गया पर न जाने क्यों उन्होंने वह मुझे नहीं दी। मैं उसे क़ीमत देकर लेने वाला था क्योंकि मेरा कथन है कि किताब भेंट में लेने से वह जुड़ाव नहीं बनता जो ख़रीदने से पैदा होता है। लेकिन जब लेखक सामने हो और ख़रीदी गई किताब पर वह हस्ताक्षर मात्र कर दे तो जो जुड़ाव बनता है वह उसकी लिखी पुस्तक रूप में चिरंतन होता है।
जसदेव चले गए और अब यह तो नहीं होगा। मगर मैं अब किताब ज़रूर खरीदूंगा कि जान सकूँ क्या है उसकी अहमियत। निश्चित ही वह आत्म कथा से परे एक ऐसा दस्तावेज़ होगी जिसमें उनके आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे दो राष्ट्रीय प्रसारण माध्यमों की लम्बी यात्रा के सामान्य से लेकर सूक्ष्म तक के अनेक अनुभवों का संकलन मिल सकता है। मुझे तो लगता है कि यह पुस्तक हमारी आज़ादी के बाद के कालक्रम में घटित कई सारी महत्वपूर्ण घटनाओं पर रोशनी डालने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज़ होगी। राष्ट्रीय पर्वों और खेल की दुनिया से जुड़े जसदेव सिंह के अनुभवों का वह एक ऐसा संकलन होगी जो अपने में सजीव वर्णन समेटे , पढ़ने वालों के लिए इतिहास को पुन:जीवित कर उसे महसूस भी कराएगी। कौन जाने कि भविष्य में लोग माँग करने लगें कि उनकी आवाज़ में प्रसारित वर्णन संकलन रूप में बाज़ार में उपलब्ध हों।
यह लिखते हुए मुझे कई और नाम याद आ रहे है जिन्होंने अपनी आवाज़ में देश को न जाने कितनी तत्कालिक सूचनाएँ दीं। अशोक बाजपेयी, देवकीनन्दन पांडे, विनोद कश्यप , मैलविल डीमैलो, लोथिका रत्नम , आदि के अतिरिक्त उन लोगों से क्षमा चाहते हुए , जिनके नाम , स्मृति से ग़ायब हैं , पर आवाज़ रूप में वे इस क्षण भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं , कुछ ऐसे लोग थे , जो जसदेव जी के साथी सहयोगी रहे होंगे। आपस में इनमें तब व्यवसायिक होड़ भी ज़रूर रही होगी पर बाद में टी-टेबल पर भी बैठ कर हँसोड़ क्षण भी एक दूसरे की समालोचना करते हुए , इन्होंने ज़रूर जिए होंगे।
कल लोदी शमशान स्थल पर जसदेव के पार्थिव अवशेष पंच तत्व में विलीन हो गए। परिवार जनों के अतिरिक्त उनके सहयोगी रहे साथियों ने भी अंतिम विदाई दी। मगर वे बहुत ज़्यादा नहीं थे। हाँ, यह सच नहीं झुठलाया जाना चाहिए कि 87 वर्षीय जसदेव के अनेक साथी उनके देखते देखते चले गए होंगे और जो बच गए ,अब वे भी किसी न किसी मजबूरी से घिरे , अपने घरों में बैठे वहीं से उन्हें यादों की पुष्पांजली चढ़ा रहे होंगे। मै हैरान रहा कि जिस व्यक्ति ने प्रसारण को एक अहम पहचान अपने कार्यकाल में दी , उसके अंतिम विदाई क्षणों को समेटने वाला कोई नहीं दिखा। वैसे उनके निधन की शाम 25 सितम्बर,2018 को बी.बी.सी. सहित देश के अनेक चैनलों ने बड़ी प्रमुखता से उनके निधन के समाचार को अपने बुलेटिन में जगह दी और दूसरे दिन तक इसे स्क्रोल पर भी चलाया ताकि लोगों को जानकारी हो जाए कि एक आवाज़ , जो माइक्रोफ़ोन हाथ में थामते हुए कमेंट्री शुरू करने से पहले परिचय देती हुई कहती थी, ‘मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं’ , सदा के लिए मूक हो गई है।
जसदेव , नई पीढ़ी के लिए अनजान भले ही हों पर जो लोग प्रसारण की दुनियाँ में आज सीखना चाहते हैं , कमेंट्री की बारीकी को जानना चाहते हैं, खेल का सजीव प्रसारण कैसे हो , यह जानना चाहतें हों या कि किसी राष्ट्रीय पर्व को शब्दों में सजीव करने की कला को समझना चाहते हों , उन्हें हमारे पुरोधा कमेंन्टेटरों को सुनना चाहिए, जसदेव को सुनना चाहिए। दूरदर्शन और आकाशवाणी को चाहिए कि वे अपनी खो गईं हस्तियों /आवाज़ों को लोगों तक पहुँचाने के लिए इनकी रिकॉर्डिंग की सीडी/डीवीडी बना कर बाज़ार को दे। व्यवसायिक नफ़े की बात को लाकर इस काम को छोड़ना ठीक नहीं होगा। मीडिया समीक्षकों के लिए भी एक ज़िम्मेदारी बनती है। उन्हें पुस्तक रूप में ऐसी पठनीय सामग्री आज के कुकुरमुत्ते से उग आए रिपोर्टर/एंकरों को देनी चाहिए जो प्रसारण में प्रस्तुति के लिए सिलेब्रिटीज बन गए बीती पीढ़ी के अनेक नामों से मिलवाएं जिनका अनुसरण कर आज का छिछला प्रसारण करने वाले तथा-कथित एंकर अपने को सुधारें ही नहीं बल्कि अपनी लाईव प्रस्तुति को नये आयाम भी दे पाएँ।
जसदेव सिंह चले गए पर ऐसी ‘वाणी-आकाश ‘से लगातार गूँजती रहेगी जो कहेगी कि बोलने की कला सीखना चाहते हो तो अपने विषय से सम्बन्धित सामग्री का अध्ययन पहले करो, उसकी सरल अभिव्यक्ति के लिए शब्द और उच्चारण जानों। लोगों से माइक्रोफ़ोन पर बात करो, प्रवचन से दूर रहो ज़्यादा बोलो मत , चीख़ो मत। टेलीविजन पर देखने वालों को वह बताएं जो दृश्य में न हो , ताकि जब नज़र की इंद्री देखने में मस्त हो तो कर्ण की इंद्री ख़ाली न रहे।शब्द और दृश्य का संतुलित सामनजस्य जादुई ताक़त रखता है। वह दर्शक और श्रोता , दोनों को ट्रांस में ले जा सकता है। यह साधना और गुरू अनुसरण से ही संभव है। तकनीक ने गुरू का उनके जीवन के बाद भी जीवित रखना संभव कर दिया है जिसका लाभ उनका मार्गदर्शन बटोरने वाले चेलों को ही मिल सकता है।
जसदेव सहित प्रसारण के सभी बिछड़े गुरुओं को हमारी प्रणामी श्रद्धांजलि।