‘सर्जनपीठ’ की ओर से आयोजित ‘ह्वाट्सएप राष्ट्रीय पत्रकारीय आयोजन सम्पन्न

जान जोख़िम में डालकर हमारे लिए ख़बरें जुटाते आ रहे योद्धा

कोरोना के आरम्भकाल से अब तक हमारे देश के मीडियाकर्मी कोरोना रोग-संक्रमितों तक पहुँच रहे हैं; सम्बद्ध चिकित्सालयों, अन्य उपचार तथा परीक्षणस्थलों, चीर-फाड़-केन्द्रों पर जान हथेली पर लिये जा रहे हैं, ताकि समाज तक सही तस्वीर पहुँचायी जा सके। पलायन कर रहे स्वस्थ और कोरोनाग्रस्त श्रमिकों तथा शासन-प्रशासन की कुव्यवस्था के शिकार अन्य लोग की कहानी उन्हीं की ज़बानी हमारे जो मीडियाकर्मी सुनाते-दिखाते- पढ़ाते आ रहे हैं, उनके जीवन की सुरक्षा के प्रति केन्द्र-राज्य की सरकारें तथा प्रशासन कितने संवेदनशील हैं; हमारे कितने पत्रकारों के परीक्षण किये गये हैं? उनकी सुरक्षा के लिए कौन-से उपाय किये गये हैं? ये सभी प्रश्न आज बहस के विषय बन चुके हैं। प्रसिद्ध भाषाविद्-शिक्षाविद् आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय केे आयोजकत्व मेंं इस विषय को बृहद् स्तर पर उठाने के उद्देश्य से बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा सामाजिक मंच ‘सर्जनपीठ’ की ओर से ह्वाट्सएप के माध्यम से २५ जून को एक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया, जिसमें देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्रों के सम्पादकगण, टी०ह्वी० पत्रकार तथा अन्य वरिष्ठ पत्रकारों की भागीदारी रही।

निशीथ जोशी

‘राष्ट्रीय सहारा’ के पूर्व-सम्पादक और ‘पंजाब केसरी’, देहरादून के स्थानीय सम्पादक निशीथ जोशी का मानना है,”सतर्कता, संयम और सावधानी– इन तीनों का पालन मीडियाकर्मियों के लिए आवश्यक है। ६३ वर्ष की अवस्था में मैं लगातार रिपोर्टिंग करता रहा; उन क्षेत्रों में जाता रहा, जहाँ कोरोनावायरस संक्रमण का ख़तरा अधिक है। यह व्यक्तिगत अनुभव है। मीडियाकर्मियों को चाहिए कि वे रिपोर्टिंग करने से पूर्व योग, प्राणायाम तथा ध्यान के साथ शरीर के लिए विशेष यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करें। व्यायाम जीवनशैली का प्रमुख अंग है। यही विकल्प है कि हम अपनी रक्षा स्वयं करें। उसके बाद भी यदि कोई पीड़ित होता है तो सरकार को उसे सभी तरह से चिकित्सा और सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए।”

अरुण श्रीवास्तव

‘दैनिक जागरण’, नोएडा के फ़ीचर-सम्पादक अरुण श्रीवास्तव की मान्यता है,”यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने प्राणों की परवाह किये बिना अस्पतालों, क्वारंटाइन केन्द्रों, घरों-गाँवों की ओर लौट रही जनता की दारुण सच्चाई को जन-जन तक पहुँचानेवाले मीडियाकर्मियों की केन्द्र अथवा राज्य-सरकारों-द्वारा कोई सुध नहीं ली जा रही है। हालाँकि तमाम सुरक्षा उपायों के बावुजूद सही ख़बरें निकालने के प्रयास में कुछ मीडियाकर्मी भी कोरोना की चपेट में आ चुके हैं, फिर भी इससे उनके हौसले में ज़रा भी कमी नहीं आयी है। मीडियाकर्मियों के इस जज़्बे और ज़िम्मेदारी को देखते हुए, सरकारों के साथ-साथ मीडिया-घरानों को भी आगे बढ़कर उन्हें और उनके घर-परिवार को समुचित देखभाल के प्रति आश्वस्त करना चाहिए, जिससे कि किसी भी संकट की स्थिति में अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन के प्रति उनकी इच्छाशक्ति सुदृढ़ बनी रहे।”

रमाशंकर श्रीवास्तव

दैनिक समाचारपत्र ‘आज’, प्रयागराज के सम्पादकीय प्रभारी रमाशंकर श्रीवास्तव का मत है, “कोरोना-काल में हमारे पत्रकारों को जिस तरह की संरक्षण-सुरक्षा मिलनी चाहिए, वह नहीं दिख रही है, जबकि वे संवाददाता कोरोनाग्रस्त रोगियों के लिए बनाये गये उपचारस्थलों, परीक्षणशालाओं, पोस्टमार्टम हाऊस आदिक स्थानों पर जाकर जनता और शासन-प्रशासन को जागरूक करने के लिए सूचनाएँ एकत्र कर लाते हैं। ऐसे में, उनके स्वास्थ्य के प्रति चिन्ता करनेवाला उनके घर-परिवार के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है। लोकतन्त्र के चौथे स्तम्भ कहलाने वाले पत्रकारवर्ग के प्रति शासन-प्रशासन को संवेदनशील होना पड़ेगा।”

भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इस परिसंवाद के आयोजक भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का मत है,”इसमें कोई मतभेद नहीं है कि कोरोना-काल में हमारे समाज और शासन को जागरूक-सतर्क करने के लिए समाचारपत्र और टी०ह्वी० समाचार-चैनलों के संवाददाता अपनी कर्त्तव्यपरायणता में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं रख रहे हैं। हाँ, वे कोरोनाग्रस्त रोगियों से सम्बन्धित जितने भी स्थल हैं, सभी जगह बेरोक-टोक जा रहे हैं; परन्तु उनका स्वास्थ्य-परीक्षण नहीं कराया जा रहा है। इस कारण उनके जीवन का ख़तरा है और उनका परिवार के हितों का भी; वहीं उनके लिए भी ख़तरे की घण्टी है, जहाँ-जहाँ वे संवाददाता आ-जा रहे हैं। यही कारण है कि आज देशभर में कोरोना-संक्रमित पत्रकारों की संख्या दहाई में पहुँच चुकी है। सम्बन्धित प्रशासन को प्राथमिक रूप में सम्बद्ध समस्त संवाददाताओं का स्वास्थ्य-परीक्षण कराना होगा।”

डॉ० प्रदीप भटनागर

‘दैनिक भास्कर’ के पूर्व-सम्पादक डॉ० प्रदीप भटनागर का विचार है,”कोरोना वायरस के इस भयानक काल को रेखांकित और इतिहासबद्ध करते हमारे पत्रकार साथी भी कोरोना योद्धा हैं। कोरोना की स्थिति की ही नहीं, अपितु कोरोना पीड़ितों की दशा की जानकारी भी देश-दुनिया को पत्रकारों से ही मिल रही है। कोरोना से बचने के उपाय हों अथवा कोरोना संक्रमित लोग का अन्तिम संस्कार हो, हर तरह की सूचना पत्रकार ही हमें दे रहे हैं। आश्चर्य है कि ख़बरों के लिए अपनी जान जोख़िम में डालकर, कोरोना संक्रमितों के बीच रात-दिन काम कर रहे पत्रकारों को कोरोना योद्धा नहीं माना गया है, जबकि कवरेज में लगे कई पत्रकार अपनी जान तक गवाँ चुके हैं। केन्द्र और राज्यों की सरकारें, डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ, सुरक्षाबलों को तो कोरोना योद्धा मानकर सारी सुविधाएँ दे रही हैं; लेकिन कोरोना संक्रमितों के बीच लगातार काम कर रहे पत्रकारों को नहीं। सरकारों ने ऐसा भेदभाव किन मानदण्डों के आधार पर किया है, यह समझ के बाहर है। मेरा स्पष्ट मानना है कि पत्रकारों को भी कोरोना योद्धा घोषित करके उन्हें उसी तरह की सारी सुरक्षा और सुविधाएँ प्रदान की जाएँ, जो दूसरे कोरोना योद्धाओं को प्रदान की जा रही हैं।”

गौरव अवस्थी

‘हिन्दुस्तान’, रायबरेली के ब्यूरो प्रमुख गौरव अवस्थी की अवधारणा है, “कोरोना- संकटकाल में सरकार तो सरकार, नौकरी/काम प्रदाता मीडिया संस्थानों ने भी पत्रकारों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। प्रशासनिक स्तर पर भी पत्रकारों को न तो बचाव के प्रशिक्षण दिये गये हैं और न ही उनके परीक्षण कराये गये हैं। पत्रकारों को कोरोना वारियर्स का दर्ज़ा न तो सरकार ने दिया और न ही संस्थान ने। पत्रकार अपने रिस्क पर कोरोना की ख़बरें जुटाते-पढ़ाते तथा पब्लिक को जागरूक करते आ रहे हैं। अगर सरकार पत्रकारों को भी कोरोना वारियर्स का दर्ज़ा दे देती तो भी पत्रकारों के परिवारहितों की थोड़ी-बहुत रक्षा हो सकती थी। खै़र, अब ये सब कहने का कोई फ़ायदा नहीं दिखता; क्योंकि मानसिक ख़तरा कम हो चुका है। शारीरिक भी धीरे-धीरे कम ही होता जायेगा।”

पवनदेव

‘स्वराज एक्सप्रेस’ न्यूज़ चैनल के प्रयागराज-संवाददाता पवनदेव का कथन है, “कोरोना वायरस की इस महामारी की कवरेज़ में स्थानीय प्रशासन ने कोई मदद नहीं की है। पत्रकार कवरेज करने के दौरान अगर संक्रमित हो जाये तो उसके लिए किसी भी प्रकार की किट और जाँच-सुविधा नहीं है। श्रमिक ट्रेनों से आये हज़ारों श्रमिकों की कवरेज़ के दौरान सिर्फ़ सोशल डिस्टेंस बनाकर और मास्क पहनकर हम ख़बर एकत्र कर रहे हैं, जबकि प्रशासनिक अमला पूरी तरह से पी०पी०टी० किट पहनकार फील्ड में मुस्तैद नज़र आता है। ऐसे में, हम पत्रकारों के प्रति सिर्फ़ सरकारी उदासीनता देखने को मिल रही है। सच यह है कि संक्रमण का सर्वाधिक ख़तरा पत्रकारों के लिए रहा है।”

अन्त में परिसंवाद-आयोजक ने समस्त सहभागियों की प्रभावकारी सहभागिता-हेतु अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।