ग्रामीण क्षेत्रों में मित्रता और प्रतिस्पर्धा का प्रतीक गुल्ली- डंडा खेल भारत का पारंपरिक और लोकप्रिय खेल रहा है।
गुल्ली- डंडा को खेलने के लिए किसी महंगे उपकरण या विशेष मैदान की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए यह सबसे सस्ता खेल है। इस खेल में ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता है। क्रिकेट की तरह जिसका बल्ला, उसकी पहले बैटिंग नहीं होती, इसलिए यह सर्वहारा वर्ग का खेल है। शायद इसीलिए उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने इसे ‘सभी खेलों का राजा’ कहा है।
हमारे समय में गुल्ली- डंडा खेलने के लिए सिर्फ तीन चीजें अनिवार्य थी-
1 . एक लंबे लकड़ी के डंडे और एक छोटी, बेलनाकार, नुकीली गुल्ली) की।
2. खिलाड़ी (कम से कम दो)
और
3. खुला मैदान
यह खेल शुरू होने से पहले एक थोड़ी लंबी और कुछ गहरी गुच्ची खोदी जाती। गुच्ची (या पाला) एक छोटा गड्ढा होता है, जो समतल मैदान पर खोदकर बनाया जाता है। इसकी आदर्श गहराई और लंबाई डंडे की मोटाई के आधार पर तय होती है ताकि गुल्ली को डंडे की सहायता से आसानी से उछाला जा सके।
अगर खिलाड़ी दो से अधिक होते तो टीम बनाई जाती। हर टीम का एक नेता या कैप्टन होता जो अपने गुइयाँ (सदस्य) चुनता। खिलाड़ियों की संख्या विषम होने पर किसी एक खिलाड़ी को बिचवानी बनाया जाता अर्थात वह दोनों तरफ से खेलता। अच्छा खेलने वाले खिलाड़ी को दोनों ही कैप्टन अपना गुइयाँ बनाने का हरसंभव प्रयास करते।
टीमें तय होने के पश्चात किसी एक खिलाड़ी की पीठ के पीछे उंगलियों से 1-2 कहकर नंबरिंग की जाती। जिस खिलाड़ी या टीम का पहला दांव (नंबर) आता, उसका सदस्य गुल्ली को गुच्ची के लंबवत रखता और फिर डंडे की सहायता से दोनों हाथों से खूब ताकत लगाकर उसे आगे की ओर जोर से हवा में उछालता। अगर विरोधी पक्ष का कोई गुइयाँ गुल्ली को हवा में कैच कर लेता तो फिर वह खिलाड़ी आउट हो जाता।
ऐसा न होने पर खेल रहा खिलाड़ी डंडा को गुल्ली के पास लंबवत रख देता और दूसरा खिलाड़ी जहां पर गुल्ली गिरी है, वहां से डंडे को टीपने, उस पर निशाना लगाने का प्रयास करता। अगर निशाना सही लग जाता अर्थात गुल्ली डंडे से टकरा जाती तो वह खिलाड़ी आउट माना जाता। अगर इससे बच गया तो खेल रहे खिलाड़ी को गुल्ली को तीन बार डंडे से उछाल कर उसे मारने का अवसर मिलता। इन तीन प्रयासों में गुल्ली डंडे से लगे या फिर खिलाड़ी हुच्च जाए, अवसर तीन ही मिलते थे। इन तीन प्रयासों में गुल्ली जितनी दूर चली जाती, उतनी दूर से विरोधी पक्ष के खिलाड़ी को उसे आउट करना होता था यानि गुल्ली को डंडे पर मारना होता था।
पहले खिलाड़ी के इन तीन तरह में से किसी भी एक तरह से आउट होने पर, दूसरे खिलाड़ी या टीम का दांव आता। वह भी इसी प्रकार खेल को आगे बढ़ाता। फिर यही क्रम तब तक चलता रहता जब तक कि गुल्ली कहीं खो न जाती या फिर घर से बुलावा न आ जाता।
हम लोग अपने गांव बरी (बैसवारा) में गुल्ली-डंडा खेलते-खेलते जब काफ़ी अभ्यस्त हो गए तो होता यह कि इस खेल में जिसका एक बार नंबर आ जाता, वह अगर पहले दो तरीक़े से आउट नहीं हुआ तो तीसरे तरीक़े से उसे आउट कर पाना लगभग असंभव हो जाता क्योंकि तीन बार में वह गुल्ली को गुच्ची से इतनी दूर ले जा चुका होता था कि वहां से उसे आउट करना, डंडे को टीपना टेढ़ी खीर साबित होता था। होता यह कि जो पदाता (खेलता), वह पदाता ही चला जाता और जो पदता, वह पद-पद के पस्त हो जाता।
इसलिए इस नीरस हो चुके खेल में एक नया रोमांच जोड़ने के लिए हमने यह नियम जोड़ा कि तीन प्रयास के किसी भी प्रयास में यदि डंडा से गुल्ली को मारते समय, दूसरा खिलाड़ी गुल्ली को हवा में ही लपक ले, तो वह खिलाड़ी आउट माना जाएगा। उसका दांव ख़तम। हालांकि ऐसा करना बहुत खतरनाक था क्योंकि खिलाड़ी का डंडा, कैच पकड़ने वाले खिलाड़ी के हाथ में, चेहरे में या शरीर के किसी भी अंग में लग सकता था।
लेकिन हम सुना करते थे कि- जिसमें जान जाने का डर ही न हो, वह असली युद्ध नहीं और जिस गेम में रिस्क ही न हो, वह असली खेल नहीं। तो इसी भाव का अनुसरण करते हुए हमने इस नियम से खेल शुरू कर दिया।
उस दिन भैया का दांव पहले आया। वह मुझसे कहीं बेहतर, निपुण खिलाड़ी थे। उन्होंने गुच्ची से गुल्ली उछाली तो मैं उसे कैच न कर पाया। फिर वहां से डंडे को भी टीप नहीं पाया। पहले दो तरीकों से वह आउट नहीं हुए तो मेरा सारा ध्यान उनको तीसरे तरीके से आउट करने पर था। यानि जैसे ही वह गुल्ली को मारने के लिए डंडे से उछाले, मैं उसे हवा में पकड़ लूं। क्योंकि अगर उन्हें तीन बार गुल्ली को हिट करने का मौका मिल गया तो वह गुल्ली को गुच्ची से इतनी दूर ले जाएंगे कि वहां से उन्हें आउट कर पाना लगभग असंभव हो जाता। फिर तो वह दिन भर पदाते और मैं दिन भर पदता।
अतः भैया ने जैसे ही पहले प्रयास में गुल्ली पर डंडा मारा और गुल्ली उछली, मैंने उसे हवा में लपकने के लिए झट से दाहिना हाथ आगे कर दिया। संयोग से गुल्ली मेरे हाथ में आ भी गई और मैंने तुरंत हाथ हटा भी लिया। लेकिन भैया गुल्ली को जोर से मारने के लिए डंडा हवा में तान कर चला चुके थे। डंडे को गुल्ली न मिली, मैं हाथ भी हटा चुका था। इसलिए डंडा सीधे मेरे चेहरे बल्कि आंख पर जोर से टकराया। गुल्ली से टकराने पर आने वाली टन्न की जगह फच्च की आवाज आई और मेरी आँख से तुरत ही खून की धारा बह निकली।
खून आंख से बहकर गाल और फिर बुशर्ट पर गिरने लगा। मैं घबराकर उस आंख को हाथ से दबाकर घर की ओर भागा और मुझसे भी ज्यादा डरे और घबराए हुए भैया मेरे पीछे-पीछे दौड़े। एक पल के लिए मुझे लगा कि मैं काना राजा बन चुका हूं क्योंकि मेरी बाईं आंख से कुछ भी दिखाई न दे रहा था। पूरी आंख खून से तर बतर थी।
घर के पिछवारे अजिया गाय को अगराशन खिलाने आई थी। वह मुझे खून से लथपथ देखकर पहले तो घबराई फिर मुझे वहीं पड़ी एक बाध वाली खटिया में चित्त करके लिटा दिया। फिर अपने आँचल से मेरी आँख का खून पोछा और फिर नबीपुर, नटई (पहले स्त्रियों को उनके गांव के नाम से बुलाया जाता था) कहकर दोनों चाचियों को बुलाने लगी। अम्मा को इसलिए नहीं बुलाया होगा कि वह मुझे राणा सांगा बने हुए देखती तो मेरी आरती उतारने के बजाय पहले पीटती, फिर कहीं मरहम पट्टी, दवा-दारू करती।
खैर दोंनो चाची के पहुंचने तकअजिया ने आंख का पूरा खून साफ कर दिया था। चारपाई में लेटने के कारण खून बहने की गति भी कुछ कम हो गई थी। अब यह स्पष्ट हो चुका था कि चोट आंख में नहीं बल्कि बाईं भौंह पर लगी थी। वहां पर एक बड़ा सा और काफी गहरा घाव हो चुका था। लेकिन आंख पूरी तरह सुरक्षित थी। अजिया ने दोनों चाचियों के सहयोग से मेरी मरहम पट्टी की और साथ ही डांटती और समझाती भी रही कि ऐसा खेल क्यों खेलते हो जिसमें आंख-नाक फूट-टूट जाये। मैं अपराधी की तरह चुपचाप सुनता रहा। अब तक अम्मा भी आ चुकी थी। सारा माजरा समझते ही वह रौद्र रूप में आ गई। मैं तो उस समय अजिया के संरक्षण में था और चोट भी लगी थी, इसलिए बच गया। पर भैया इतने भाग्यशाली नहीं रहे, उनकी जमकर और कसकर कुटाई हुई।
कुछ समय पश्चात मेरा घाव भर गया, पर चोट का निशान अब भी मेरी बाईं आंख के ऊपर स्पष्ट रूप मौजूद है। मेरे पहचान पत्र में लिखा हुआ पहचान चिन्ह – “A deep cut mark on left eyebrow” अब भी मुझे उस घटना को भूलने नहीं देता है।
(विनय सिंह बैस)
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