मेरे दादा (भाई बाबा) उस पीढ़ी के मुखिया और बड़े भाई थे, जिसमें बड़े भाई का सम्मान पिता की तरह होता था। साथ ही बैसवारा की परंपरा कि बड़े भाई को खेती-बाड़ी और घर-दुवार के अधिक श्रम वाले कार्य नहीं करने दिया जाता था।
इसी के नाते भाई बाबा का रोज का काम था- गाय, भैंस दुहना, बैलों को खरहरा करना, दरवाजे को खरहंचा से बुहारना और सुबह–दोपहर-शाम हुक्का पीना। फसलों की कटाई- बुवाई के समय मजदूरों की व्यवस्था करना, उन्हें लौनी देना। शुभ दिनों में परिवार, रिश्तेदारों के लिए बरदेखी करना। शादी-ब्याह, मूड़न-छेदन में गांव-जंवार में व्यवहार देने जाना और गांव के लड़ाई-झगड़ों में पंचायत करना।
हां, जाड़े के मौसम में उनका एक और काम बढ़ जाता था- वह था दोपहर के बाद एक छोटी कुल्हाड़ी लेकर खेतों-जंगल की तरफ निकल जाना और फिर देसी या जंगली बबूल की छोटी-पतली डालियां काटकर, उनका गट्ठर बनाकर घर ले आना। इस गट्ठर में से कुछ लकड़ियां घर के अंदर चली जाती, महिलाओं और बच्चों के तपते के लिए तथा बड़ा हिस्सा दरवाजे रख दिया जाता, मुहल्ले भर के पुरुषों के तपते के लिए।
शाम को चारा-पानी करने तथा गाय- भैंस दुहने के बाद घर के और मोहल्ले के सभी पुरुष दरवाजे स्थित नीम के पेड़ के नीचे तपते में इकट्ठा होते। लोगों के आने से पहले भाई बाबा घर से एक सूखा कंडा (उपला) और थोड़ा मिट्टी का तेल ले आते। वह पहले कंडे के ऊपर चिमनी (दीपक) से थोड़ा मिट्टी का तेल गिराते, उसके ऊपर कुछ सूखी हुई लकड़ियां रखते फिर माचिस की तीली से आग जला देते।
आग पकड़ लेने के बाद उसके ऊपर जंगली बबूल या बबूल की गीली लकड़ियां रखते जाते। सूखी लकड़ियां तो तुरंत ही आग पकड़ लेती और तेजी से जलने लगती लेकिन जंगली बबूल की गीली लकड़ियां तुरंत आग न पकड़ती। पहले उनके हरे पत्त्ते झुलसकर छोटे और काले होते, फिर टहनियों से बूंद-बूंद पानी रिसता, हरी टहनियों का रंग धीरे-धीरे काला होता जाता और फिर वह आग पकड़ती। जंगली बबूल की यह टहनियां, सूखी लकड़ी की अपेक्षा देर से आग पकड़ती लेकिन फिर अधिक देर तक जलती भी।
लोगों के आने से पहले तपता जल चुका होता था। धीरे-धीरे बैठक जमती। हुक्का, बीड़ी और कभी-कभी गांजा का भी दौर चलता। इस दौरान घर-परिवार, गांव-मुहल्ले, दुनिया-जहान की बातें होती। भूसा-चारा, शारदा नहर के आने- जाने, गेंहू की सिंचाई, कीटनाशक के छिड़काव, यूरिया खाद की किल्लत और कालाबाजारी, पौष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी में होने वाले कर्ण छेदनों, निमंत्रण-नौटंकी, रजाई-गद्दा की व्यवस्था आदि की बात होती। कभी आल्हा, फगुआ, निर्गुण के सुर भी लग जाते।
गाय-भैंस-बैल खरीदने बेचने, तकिया-सतांव के मेला, बरदेखी, शादी-ब्याह-गौने पर भी चर्चा होती। परधानी के चुनाव के समय तो मुख्य विषय परधानी ही होती। सीट जर्नल (जनरल) है कि रिज़र्व , महिला सीट है या पुरुष, इस पर और संभावित प्रत्याशियों पर चर्चा होती। कौन किसके पक्ष में है, किसने किसको मिला लिया, किससे किसकी लड़ाई हो गई, कौन बिक गया, किसने खरीद लिया, इस पर भी खूब बहस होती। कभी-कभी कुछ वाद-विवाद, गाली-गलौज भी हो जाता। यह तो हम बच्चों के लिए आनंद का स्रोत था पर मुश्किल तब होती जब कोई 13,17 या 19 का पहाड़ा या फिर उन्नाव, फर्रुखाबाद की स्पेलिंग पूछ लेता।
खैर, तपता जलता रहता। लोग जल चुकी लकड़ियों के अधजले या पीछे के भाग को पुनः तपता में डालते रहते। आग कुछ धीमी पड़ती तो नई लकड़ियां डाल दी जाती। इस तपता-बैठक दौरान गीली लकड़ियों का धुंवा जिधर जाता, उधर के लोग छोर बदलते रहते। जगह होती तब तो स्थान बदलने में कोई समस्या नहीं होती। कुछ कम जगह होती तो घेरा थोड़ा बड़ा कर दिया जाता। फिर भी जगह न मिल पाती तो लोग यह कहकर धुंवे खाने वाले व्यक्ति को सांत्वना दे देते कि-” इनकी सास इनका कुछ ज्यादै मयाति (दुलार करती) है।” तपते की यह बैठक तब तक चलती रहती जब तक की घरों से खाने का बुलावा न आ जाता।
यह तो हुई दरवाजे के तपते की बात। घर के तपते की कहानी कुछ अलग होती। इस तपते के किनारे बैठकर महिलाएं कभी सब्जी काटती, कभी लहसुन-मटर छीलती, तो कभी धनिया-मिर्ची साफ करती। कभी ऊन का गोला और सलाई लेकर सूटर (स्वेटर), जर्सी, कनटोप बुनती। बीच-बीच में बच्चों की नाप लेती जाती। साथ ही अपना तमाम दुःख-सु:ख बतियाती, मैके-ससुरे की बात करती, निंदा-बड़ाई करती। बच्चों को काजर-तेल भी कर देती।
“नींद-नींद गोहराइत है,
नींद कहै हम आइत है,
मुन्ना, बच्चा, लाला का सोवाइत है।”
जैसी लोरी सुनाकर बच्चों को सुला भी देती।
इसी तपते की आग में अजिया (दादी) आलू भून लिया करती थी। फिर भुने आलू में प्याज, टमाटर, थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर तथा मिर्च, धनिया और लहसुन वाला सिलबट्टे में पिसा ताज़ा, हरा नमक मिलाकर चोखा तैयार करती। उस चोखे का दिव्य स्वाद अब भी मेरी यादों में है। कभी-कभी इसी तपते में चुकंदर, मकई भी भुनी जाती। कोई बच्चा बीमार हो जाता, उसे सर्दी लग जाती तो अजिया एक कटोरिया में सरसों के तेल में लहसुन डालकर उबालती। जब तक तेल उबलता और लहसुन पकता तब तक वह तपते की आग से अपने आँचल को गरम करती और बीमार बच्चे के कान में अपने आँचल को प्यार से लगाती। लहसुन पक जाने के बाद, सर्दी लगे बच्चे को अधिक और बाकी बच्चों को कुछ लहसुन खाने को देती। फिर उस गरम करुआ (सरसों) तेल को तलवे, छाती और पीठ पर मलती। कुछ ठंडा हो जाने पर एक-दो बूंद तेल नाक और कान में भी डाल देती।
पूस की ठंडी रातों में सबके भोजन करने, बर्फ से ठंडे पानी से बरतन-भांडे धोने तथा चौका पोतने के पश्चात महिलाओं की दिन की अंतिम बैठक तपता के पास ही होती थी। इसी बैठक में वह सब बिस्तर पर जाने से पहले अगली सुबह के लिए चूल्हा-चौका, नाश्ता-पानी आदि की योजना तैयार करती।
हमारे घर का तपता केवल सर्दी से छुटकारा पाने का साधन नहीं था बल्कि हंसी-ठिठोली, गप्प-सड़ाका, राजनीति, कविता-कहानी, ज्ञान-धर्म-परंपरा का जीवंत अड्डा भी था। इसमें सलाह-मशविरा होता, शिकवा-शिकायत होती, सु:ख-दुःख बांटे जाते, निंदा-स्तुति भी होती। साथ ही प्यार-दुलार, मनुहार, उपचार भी होता।
वस्तुतः तपता सिर्फ पूस-माह की ठंडी-सर्दी से राहत नहीं दिलाता था बल्कि इसके ताप से पारिवारिक मूल्यों, सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना खरी होती तथा आपसी रिश्तों में गरमाहट बनी रहती थी।
(विनय सिंह बैस)
तपता जिनके बालपन का अभिन्न अंग रहा है
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