डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
हनुमान लौट आए थे।
समुद्र के उस पार से नहीं,
बल्कि एक नए युग की घोषणा लेकर।
उन्होंने जो देखा था,
जो किया था—
वह केवल कथा नहीं थी,
वह प्रमाण था।
वानर सेना पहले भी साहसी थी,
पर अब उसमें संदेह नहीं था।
“यदि एक वानर
पूरी लंका को हिला सकता है,
तो हम सब मिलकर क्या नहीं कर सकते?”
यह प्रश्न पहली बार
हर सैनिक के भीतर उठा।
सुग्रीव चुप थे।
जामवंत मुस्कुरा रहे थे।
यह मुस्कान अनुभव की थी—
जिसने समय को देखा था।
“अब सेना को आदेश की आवश्यकता नहीं,”
जामवंत ने कहा,
“अब उन्हें केवल दिशा चाहिए।”
राम ने कुछ नहीं कहा।
पर उनकी दृष्टि में
एक मौन स्वीकृति थी।
यह वही क्षण था
जब वानर सेना
सिर्फ़ अनुयायी नहीं रही—
वह सहभागी बन गई।
अब वे युद्ध नहीं करने जा रहे थे—
अब वे न्याय स्थापित करने जा रहे थे।
अंगद को दूत बनाकर भेजा गया।
यह निर्णय साधारण नहीं था।
अंगद—
जो स्वयं राजवंश से था,
जिसका पिता मारा गया था,
और जिसने रावण का अहंकार देखा था।
वह अकेला लंका पहुँचा।
इस बार कोई चोरी नहीं थी,
कोई छल नहीं।
वह सीधा सभा में गया।
रावण वहीं था—
पर अब वह वैसा नहीं था।
“मैं राम का दूत हूँ,”
अंगद ने कहा।
सभा हँसी नहीं।
यह परिवर्तन था।
अंगद ने अपना पैर आगे बढ़ाया।
“यदि इस पैर को
कोई भी योद्धा हिला दे,
तो युद्ध टल सकता है।”
यह चुनौती नहीं थी—
यह अवसर था।
वीर उठे।
महाबली आगे आए।
पर पैर नहीं हिला।
रावण स्वयं आगे बढ़ा।
उसने पूरा बल लगाया।
धरती नहीं हिली।
रावण का मुख लाल हो गया।
अंगद ने कहा—
“यह पैर नहीं है,
यह उस धर्म की जड़ है
जिसे तुम उखाड़ नहीं सकते।”
सभा मौन थी।
यह वही लंका थी
जो कभी हँसती थी।
अब वह सोच रही थी।
अंगद लौट आया।
बिना युद्ध के
एक और विजय लेकर।
लंका में भय लौट चुका था—
पर इस बार
वह रावण के पक्ष में नहीं था।
राक्षस पूछने लगे—
“क्या हम जीत पाएँगे?”
यह प्रश्न
किसी भी युद्ध में
सबसे खतरनाक होता है।
विभीषण ने अंतिम बार समझाया।
“यह युद्ध बाहुबल का नहीं है,
यह धर्म का है।”
रावण ने सुना नहीं।
वह सुनना नहीं चाहता था।
पर उसकी नींद टूट चुकी थी।
दूसरी ओर,
वानर शिविर में
कोई प्रश्न नहीं था।
केवल तैयारी थी।
सेतु बन रहा था—
केवल पत्थरों से नहीं,
विश्वास से।
राम ने धनुष उठाया।
यह संकेत था।
अब युद्ध अवश्यंभावी था।
पर एक सत्य स्पष्ट हो चुका था—
युद्धभूमि में
केवल वही हारता है
जो पहले भीतर से हार चुका हो।
और वह हार
लंका में हो चुकी थी।